चक्की के दो पाटों में
मुट्ठी भरकर गेहूं देती थी
घुमा- घुमा कर पाटों को ‘मां’
मिस्सा आटा कर लेती थी।
सिल बट्टे पर पीस चटनी
कुंडी भरकर रख लेती थी
तेल हींग का लगा बघार
सौंधा छाछ बना कर देती थी।
वही आंगन के चूल्हे सिकती
नून- मिर्च की रोटी थी
सौंधी खुशबू उस पर लगे
नौनी घी की होती थी ।
उचक -उचक कर नलके का
आंगन में पानी छिडकाता था
मिट्टी की खुशबू संग मेरा
बचपन वही महकता था।
घेर में मेरे नीम पेड़ की
डाल पर झूला डालता था
रिमझिम बूंदों की खुशबू संग
सावन उस पर ही गवता था।
उड़ा ले गई नई सभ्यता
मिट्टी के चुल्हे की खुशबू
फूंकनी मार-मार चूल्हे में
माँ दिखाती थी मुझे जादू।।
– लीना शर्मा
