मैं बिल्कुल आपके सरीखा
मेरे भी दो हाथ पैर हैं।
हाथ हथौड़ा और फावड़ा
हँसिया सब्बल रहे साथ हैं।
महनत और मजूरी से ही
जीवन का नाता अक्षय है।
मिलती रही मुझे भी अक्सर
अपने ही श्रम की मजदूरी।
कभी देर से कभी दूर से
पूरी अथवा कभी अधूरी।
घोर अभावों विपदाओं का
रहता चारों ओर वलय है।
पुनरुत्थान जहाँ चलता हो
अथवा नव निर्माण जहाँ है।
मेरा है अस्तित्व वहीं पर
समझो मेरा प्राण वहाँ है।
श्रम साधना वहीं संचालित
और वहीं साँसों का क्षय है।
बिना हमारे कभी आपके
स्वप्न न पूरे हो पाएँगे।
दुनिया ठहर जाएगी उस दिन
जिस दिन हम थक सो जाएँगे।
श्रम के इन संगीत सुरों से
जीवन में नव गति नव लय है।
-राजेंद्र श्रीवास्तव
