“गौरैया की प्यास”
मेरा गौरैया-सा प्यासा मन,
कैसी भीषण गर्मी है।
सूख गए संवेदन के सोते,
आँखों में अब कहाँ नमी है॥
तपती धरती, झुलसे पत्ते,
छाँव हुई अब दुर्लभ सी।
पानी की दो बूँदों खातिर,
भटके गौरैया व्याकुल सी।
मानव की इस भागमभाग में,
प्रकृति कितनी सहमी है।
मेरा गौरैया-सा प्यासा मन,
कैसी भीषण गर्मी है॥
आँगन सूने, छप्पर खाली,
कहाँ गए वे नीड़ पुराने।
कंक्रीटों के ऊँचे जंगल,
खा गए सपने सुहाने।
दाने-पानी को तरस रही,
जीवन की हर क्यारी है।
मेरा गौरैया-सा प्यासा मन,
कैसी भीषण गर्मी है॥
रख दो थोड़ी छाँव द्वार पर,
जल से भर दो एक कटोरी।
छोटा-सा उपकार किसी का,
बन सकता जीवन की डोरी।
करुणा से ही जग महकेगा,
यही प्रकृति की वाणी है।
मेरा गौरैया-सा प्यासा मन,
कैसी भीषण गर्मी है॥
आओ मिलकर प्रण ये लें हम,
हर आँगन हरियाली होगी।
प्यासे पंछी मुस्काएँगे,
फिर से सुख-खुशहाली होगी।
जीवन का संदेश यही है,
सेवा सबसे बड़ी है।
मेरा गौरैया-सा प्यासा मन,
कैसी भीषण गर्मी है॥
-डॉ. प्रीति समकित सुराना
