यूँ तो साहित्य से लगाव सबका ही रहा करता है।
कोई पढ़कर संतुष्ट होता तो कोई लिखकर।
मैं बचपन से ही साहित्य प्रेमी रहा हूँ।
मेरे पूज्य पिता उपन्यास प्रेमी रहे थे तो मैं भी यदा कदा उपन्यास पढ़ लिया करता था।
जासूसी किताब और देवकिनदंन खत्री का चंद्रकांता बहुत शौक से पढ़ा करता था।
गुलशन नंदा के उपन्यास भी रूचिकर थे।
इक्कीस्वीं सदी में प्रवेश करते ही मोबाईल युग आया।
मोबाईल एक चलता फिरता शिक्षालय हो गया।
साहित्य के अनेक मंच बन गए।
पर मेरा साहित्य का वास्तविक सफर अंतरा शब्द शक्ति परिवार से जुड़ने से शुरू हुआ और जारी है।
मैं आदरणीया प्रीति समेकित सुराना जी का आभारी हूँ कि उन्होंने मुझे साहित्य सृजन के रास्ते पर ला खड़ा कर दिया है।
अतिरिक्त उपलब्धियों में पेंटिंग पर नेशनल अवार्ड के साथ- साथ क्षेत्रीय भाषा साहित्य में स्कूल और कॉलेज की पाठ्यक्रम में शामिल कविता कहानी पाठकों के दिल को छूते हैं।
आदरणीया डॉ प्रीति समेकित सुलाना के विशेष सहयोग के बिना साहित्य के क्षेत्र में मैं ये मुकाम हासिल नहीं कर पाता।
अंतरा शब्द शक्ति प्रकाशन से मेरी दस किताबें छप चुकीं हैं जो शायद डॉ सुराना के आशीर्वाद के बिना संभव नहीं था।
आज साझा संकलन की किताबों को लेकर कही जाए तो मेरी 20 किताबों का प्रकाशन हो चुका है।
साहित्य का सफर जारी है।
-अजय पाण्डेय बेबस
