मेरा बचपन किताब, मैगजीन और अखबार के सानिध्य में ही बीता। बड़े हुए तो बच्चों की पत्रिकाएं चंपक, नंदन, लोटपोट पराग पढ़ने लगे।
कुछ और बड़े होने पर गीत ग़ज़ल कविताएं समझने लगे।
कविताएं पढ़ने में एक विशेष आनन्द मिलता था।
बाद में आलेख छोटी-छोटी कहानियां लिखनी शुरू की।
दैनिक भास्कर की मधुरिमा में मेरी रचनाएं लगातार प्रकाशित होने लगी। फिर मैंने गृहशोभा, सरिता के लिए भी लिखा।
विवाह के बाद ये यात्रा रूक गई।
काफी समय बाद जब मेरी बड़ी बेटी ने आलतू फालतू कागज पर मेरा कुछ लिखा हुआ पढ़ा।
तो उसने वो कागज सम्हालने शुरू कर दिये।
लगभग बीस वर्ष के बाद मैंने फिर लिखना शूरू किया है।
अंतरा शब्द शक्ति से कुछ किताबें भी प्रकाशित हुई हैं। और भी बहुत से ग्रुप में जुड़ी हुई हूं।
हां बीच बीच में व्यस्तता के चलते कुछ दिन नहीं भी लिख पाती हूं । पर रचनात्मक यात्रा मन को सुकून देती है। जो आगे भी यूं ही जारी रहे यही चाहती हूं।🙏
-नमिता दुबे मिशा
