कुछ हैं जामो शराब में ज़िंदा
और कुछ जी जनाब में ज़िंदा
मौत बरहक़ है फिर भी हैं हम सब
“ज़िंदगी के अज़ाब में ज़िंदा”
चन्द यादें जो दफ़्न कर दी थीं
रोज़ होती हैं ख़्वाब में ज़िंदा
उनका चेहरा है मेरी आंखों में
जैसे ख़ुश्बू गुलाब में ज़िंदा
कितने अश्आर उस सुख़नवर के
हैं मिरे इन्तख़ाब में ज़िंदा
जब घटा से क़मर निकल आया
हुस्न फिर क्यूं नक़ाब में ज़िदा
“अक्स” उनका है मेरी आंखों में
जिस तरह मीन आब में ज़िंदा
-सोनिया अक्स
