मेरी बादशाहत

तू मुझे भले अपना न माने पर,मैं तो सबको बतलाऊँगा, ज़हीर ऐसे होते हैं।
आ जा मेरे दोस्त ग़रीबखाने पर,दुनिया को दिखलाऊंगा दिल ए अमीर कैसे होते हैं।

तेरे अकीदती इश्क़ को बड़ी शिद्दत से बदनाम किया है,हसरती किताबों ने,
कभी ला डायरी मयख़ाने पर,कहने में ना तुतलाऊँगा, शायरी के कबीर ऐसे होते हैं।

लाख छिपाओ अपनी अंदाज ए आरजू मुझसे, फिर भी मशहूरियत ग़र चाहो,
कविता लिखों अफ़साने पर,मैं जमाने को सुनवाऊँगा, नखरे नज़ीर कैसे होते हैं।

हैदरी हुनर हाँसिल है मुझे तो क्या, दिल ए दावत में,नया स्वाद भी तो चखे लोग,
बज्में बिरयानी में मिलाऊँ चावल पुराने पर, चखवाऊँगा, शाही पनीर कैसे होते हैं।

ख़ुदा, ज़ुदा है खु़दसे या शामिल है कायनात ए नक्काशी में, पहचान अदाकारी,
कभी गा कव्वाली को बुतखाने पर,तब समझाऊँगा, सूफी फ़कीर कैसे होते हैं।

उठाकर गिरा देते हैं अक्सर हमें,कलमदान से घिसीपिटी पुरानी निब मानकर,
कभी वो भी नज़र डाले घराने पर,सिर्फ हक़ जतलाऊँगा,स्याह लकीर कैसे होते हैं।

मेरी बादशाहत मुझसे है या तुझसे, ये राज़ लोगों के लिए बना रहने दे।
तीर सदा लगना चाहिए निशाने पर,तेरी जीत झुंठलाऊँगा, हम-हमीर ऐसे होते हैं।

चाहे तुम मीर हो,हीर हो या मेरी तकदीर हो,तस्वीर में ही क्यों रहते हो यार?
अहसान है मण्डेला के जमाने पर,दिखा तुम्हें इतराऊँगा, उसके वज़ीर ऐसे होते हैं।

ज़हीर-चमकदार, नज़ीर-मिसाल, बज़्म -महफ़िल,

-सत्येन्द्र मण्डेला

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