मेरे दिल के भाव जब,
शब्दों का रूप ले लेते हैं….
तब मेरे जज़्बात सिर्फ
मेरे ही नहीं रह जाते
जाने और कितनों के हो जाते हैं।
मेरे पन्नों से निकलकर
जाने कितने दिलों में
घर कर जाते हैं वो भाव
जो कभी सिर्फ मेरे थे,
मेरी कलम से निकले थे।
और कितने ही और भी
मुझ-सा सृजन गढ़ लेते हैं।
ये कविताओं की दुनिया मुझको
जाने क्यों अपनी-सी लगती है?
जाने कितनी जिन्दगियां
जीने को मिल जाती है मुझे
बस इनके ही ख्यालों में।
कहीं भी गए बिना,
समेट लेती हूं
कितनी ही अनुभूतियां।
कभी लिखते-लिखते
नम हो जाती आंखें,
तो कभी उभर जाती है खिलखिलाहट।
कभी अतीत में खोती जाती,
कभी भविष्य के सपने सजाती होती।
तन्हा जब पाती है मुझको,
आ दौड़ लिपट जाती है।
तब सबसे ज्यादा अपनी-सी लगती है,
बस इन ख्यालों की ही दुनिया मुझको।
-आकांक्षा प्रिया
