मेरे प्रिय अंतरमन…

मेरे प्रिय अंतरमन,
आज जीवन के इस सफर में, इस मोड़ पर तुमसे बात करने की इच्छा है।
सुन रहे हो ना मेरी बात
जो कोई भी नहीं सुन सका, उस मौन के साक्षी हो तुम। जिसे कोई भी नहीं देख सका उस दर्द के मूक दृष्टा हो तुम।
फिर भी बहुत कुछ ऐसा घटता है जो तुम्हारी दृष्टि से भी छुपा रहता है। चोट हमेशा हृदय पर नहीं लगती। कभी कभी दिमाग हिल जाता है।
वही सवाल मन में बार-बार उठता है। ये सब हमारे साथ ही क्यों?
क्यों अच्छाई हमेशा हारती है। भलाई करके भी बुराई मिलती है। क्यों? क्यों?
आंख बंद कर सोचें तो उत्तर नदारद हैं।
तभी मन की गहराईयों से जैसे एक आवाज आती है। वक्त से पहले और किस्मत से ज्यादा किसी को नहीं मिलता।
ठीक है पर हमारे हिस्से का तो मिले।
हाहाहाहाहा हँस क्यों रहे हो अंतरमन?
तुम खुद कौन होती हो अपना हिस्सा निर्धारित करने वाली।
हां सच है हमें खुद अपने योगदान, कर्तव्य को शिद्दत से निभाना आना चाहिए। बाकी सब प्रकृति के साथ है।
धन्यवाद अंतरमन मैं समझ गई तुम्हारी बात।
सुनो अंतरमन बहुत सी दुविधायें सताती है, मन को परेशान करतीं हैं। फिर भी तुम हर परिस्थिति में मुझे सम्हाल लेते हो। और आगे चलने को प्रेरित करते हो।
धन्यवाद अंतरमन कठिन परिस्थितियों में सही मार्गदर्शन के लिए। 🙏

-नमिता दुबे मिशा

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