मै हूँ ।
गहराती रात की
एकान्त खामोशी है
और
कमरे में
नंगी पीठ सी सपाट
चुभती रोशनी है।
रात जवान हो
तो रोशनी भरी पूरी
और भड़कीली दिखती है।
आधी रात गये
सन्नाटे की सीऽऽ-सीऽऽ सी
मादक आवाज
दूर बहुत दूर तक
गूंजती है।
दरअसल ये रोशनी
ये खामोशी
ये रात भी
सब मै ही हूँ।
सो रही सहचरी को नहीं पता
आधी रात की रोशनी का सच,
फैलते इस सन्नाटे का मादक शोर।
नींद को क्या पता
रात कैसे जवाँ होती है?
रोशनी आधी रात
किस कदर रोशन होती है?
रात भर सन्नाटा
कितना कुछ बोलता है?
दुनिया जब बेहोश होती है
बादलों के घने खेत में
छुपता – छुपाता
दीवाना चाँद
किससे मिलने निकलता है?
आसमान का पूरा चाँद
धरती पर पूरा जगा मै
दोनों दरअसल जम गये हैं।
नहीं मिली चाँद को
कभी उसकी मासूका।
अलबत्ता नजर गड़ाये
सूरज ने हमेशा ग्रहण लगाया है।
चाँद, मै और मुझ से कुछ लोग
कहीं न कहीं जग रहे होगें
यह कविता केवल उन्हीं के लिए है।
-विजय कुमार अग्रहरि ‘आलोक’
