विद्रोह, विद्रोह, विद्रोह…
कुछ नसीहतों के विरुद्ध,
नहीं जी सकता
खुद की खातिर,
नहीं हँस सकता
अपनों से मुँह मोड़कर,
आखिर
कैसे सहमत हो जाऊँ
अपने सिद्धांतों के विपरीत,
यदि
मेरे सिद्धांत
पोषित करते हों
किसी के आशावाद को,
ज्योत बने हो विश्वास की,
अनुभूति देते हों स्वजनों के आस की।
बेशक
जिस पल मेरी मृत्यु होगी,
मेरे प्रति
पूरी तरह सम्बोधन बदलेगा,
अरे,
जब मैं
खुद से ही मुँह मोड़ चुका हूँ
इस अवस्था में,
सब के लिए
घातक हो चली हो
मेरी पार्थिव देह,
फिर मेरा ही फर्ज बनता है मैं कहूँ
‘प्रेमपाश में
अधिक न बंधो
कर दो मुझे मुक्त,
होना चाहता हूँ
पञ्चतत्व में विलीन,
मेरी यह अनंत यात्रा
किसी और के लिए ही तो है,
आओ,
उठाओे,
यह याद कर कि
किसी ने फ़र्ज में
अपनी पूरी जिंदगी झोंक दी
कुछ अपना फर्ज निभाओ,
इस दैहिककाल में
निर्मिती के प्रति
मैंने यदि कुछ किया
यही तो
“अपने निर्माता” का सम्मान है,
अपने लिए जिया
तो क्या जिया,
परहित में चल बसा
यही कुदरत को
साष्टांग प्रणाम है,
जीवन की हर चुनौती
स्वीकार है
पर निज स्वार्थ पर व्यय
श्रम, समय व पैसा
धिक्कार है।
हँसता जरूर हूँ
खुद के कर्तव्यों की संतुष्टि पर
खुल कर नाचता भी हूँ
अपने सिद्धांतों की रागिनी पर,
तभी तो
अपरिमित खूशी महसूस करता आया हूँ।
मेरे इस पागलपन् की तस्वीरें
हर उस अजीज के दिल में जड़ी है,
जिनके साथ मैं जीता आया हूँ,
मेरा बचकाना
मेरा बचपना,
मेरी जिंदादिली
मेंरी दिल्लगी,
मेरी गंभीरता
सभी अदाएँ
मेरे अपनों के ज़हन में कैद हैं,
क्योंकि उनकी देह में
उनका नहीं
अनवरत
मेरा ही दिल धड़कता है।
मित्र,
जिंदा रहकर
चाहे खुद के लिए
अपनी जिंदगी न जी हो,
न रहने पर
सभी के लिए
एक अबूझी प्यास ही सही
स्वातिबूंद सा अहसास
बनकर रह लूँगा।
जिसे तुम मेरी नासमझ मृत्यु
कहने जा रहे हो
सोचना गंभीरता से,
उस पार्थिव अवस्था में
मुझे उठाने वाले हाथ
बिना भूकंप के
क्यों थरथरा रहे हैं?
जो सदा
विश्वास से लबरेज रही
उन आँखों में
भादौ के बिना
ये जल सैलाब क्यों है?
पता करना
सुनामी सा तूफ़ान
किस दिल में नहीं उठा?
ख़ुद के प्रति
एक लापरवाह का जाना
क्यों दैवीय प्रकोप सा आभास
दे रहा है?
मित्रों,
तब मेरे
चेहरे पर फैली मुस्कान
यही बात कहेगी-
“मैंने कभी-कभी
अपने अजीजों की
वे बहुमूल्य बातें नहीं मानी
जो मुझे
मेरी राह डिगा सकती थीं,
शायद
मुझे वैभव के शिखर पर
देखना चाहती थीं।”
किन्तु
बावजूद इसके
आज इस दहलीज पर
मैं बहुत खुश हूँ ।
मैं बहुत खुश हूँ ।
-प्रदीप कुमार अरोरा
