पहले कुछ घरों में होती थी,
अक्सर इकलौती होती थी..
फिर सभी के घरों में होने लगी,
पर होती अक्सर इकलौती ही थी..
धीरे-धीरे अधिकार जमाकर,
पर्सनली सबकी होने लगी थी मैं..
मेरी पूजा कर पेड़े बंटते थे,
गली में शान से मुंह दिखाई होती थी..
पहले मैं सिर्फ काली होती थी,
फिर रंग-बिरंगी भी आने लगी थी..
जेंट्स, लेडीज़, स्पोर्ट्स आदि,
मेरे प्रकार अनेकानेक हुआ करते हैं..
आवागमन का साधन थी मैं,
सामान ढोने के भी काम आती थी..
चेन चढ़ाकर, पैडल मारकर,
हवा भराकर होते सब रफूचक्कर..
खेल-खेल में होता था व्यायाम,
नहीं काटते थे वो डॉक्टरों के चक्कर..
समय बदल गया, दुनिया बदली,
मेरे अस्तित्व पर भी आया था संकट..
पर अब ऐसी कोई बात नहीं है,
मेरा स्वतंत्र अस्तित्व व पहचान है..
सब मुझको मान रहे हैं
मेरा उपयोग भी कर रहे हैं..
सेहत सबकी बना रही हूं..
ओजोन पर्त को बचा रही हूं,
ग्लोबल वार्मिंग रोक कर मैं,
पर्यावरण मित्र कहला रही हूं..
-सुषमा अग्रवाल
नागपुर (महाराष्ट्र)

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बढ़िया👌