मौन

‘अपराधबोध’

…..रोज की तूतू मैंमैं से तंग आकर राजेश बड़े भारी मन से अपनी माँ को वृद्धाआश्रम छोड़ आया। उसके आठ साल के बेटे ने अपनी माँ से दादी को रोकने की बहुत जिद करी किन्तु सयाली के कान पर जूं तक न रेंगी।सयाली को माँ जी की टोका-टाकी बिल्कुल पसंद नही थी।
राजेश माँ को छोड़ तो आया था लेकिन मन वहीं लगा रहता था।इसलिए वो हर रविवार अपने बेटे के साथ कुछ न कुछ माँ के पसन्द की चीज़ लेकर उनसे मिलने जरूर जाता था।इसपर भी सयाली को चैन नही था,आश्रम से लौटने पर वो राजेश को खूब सुनाती,पर राजेश एक कान से सुनता और दूसरे से निकाल देता,बहस वो करना नही चाहता था।
समय अपनी रफ्तार से बढ़ रहा था।राजेश का बेटा मुकुंद अब ग्रेजुएशन कर रहा था।सयाली भी माँ के न होने से अब कुछ शान्त हो गई थी।लेकिन राजेश और उसके बेटे ने अभी भी माँ से मिलने का क्रम नही तोड़ा था।
एक दो साल के भीतर ही मुकुंद को कम्पनी की तरफ से एक अच्छा ऑफर आया और उसकी एक अच्छी सी कम्पनी में जॉब लग गई।
मुकुंद को जॉब करते हुए लगभग एक साल हो चुका था।अब वो अपने पैरों पर खड़ा हो चुका था,शायद कुछ निर्णय अब वो ले सकता था।
एक दिन जब वो दोनो वृद्धा आश्रम जा रहे थे तो उसने माँ से थोड़ी ऊँची आवाज में कहा “मम्मी आज मैं अपनी दादी को घर वापस लेकर ही आऊँगा, आप आज मुझे नही रोकोगी,,,,अब ये निर्णय मेरा है….मै अब उनकी देखभाल करने में सक्षम हूं…”
बेटे को ऊँची आवाज सुन सयाली कुछ सहम गई और थोड़ा रुक कर बोली,”…पर बेटा, दादी तो वहां अच्छे से रह रही हैं.. और तुमलोग भी तो उनसे मिल ही आते हो”!!!
” नही मम्मी घर,घर ही होता है,और अब उनकी उम्र हो गई है,उन्हें ज्यादा देखभाल की जरूरत है”।
“पर मैं कह रही थी कि…”। माँ को बीच मे ही रोककर मुकुंद बोला “आपको याद है,अभी तीन साल पहले नानी की तबियत खराब हुई थी तो मामी ने कितनी सेवा करी थी नानी की,और वो जल्दी ही ठीक हो गई थी;तब आप ही सबको बताती थी मेरी भाभी बहुत अच्छी है मेरी मां का बहुत खयाल रखती है भगवान ऐसी बहु सबको दे,तो मम्मी आप भी मामी जैसी बहु क्यो नही बन सकती?क्यो मामी जैसी सेवा आप दादी की नही कर सकती? मुकुंद के प्रश्नों की झड़ी को रोकते हुए राजेश ने भी सयाली को समझाया कि देखो बेटा ठीक कह रहा है, माँ को अब हमारी बहुत जरूरत है,और हम तीनों मिलकर उनका ख्याल रखेंगे। सयाली बेटे के प्रश्नों के आगे मौन हो चुकी थी,उसे सिर्फ अपनी बीमार माँ याद आ रही थी।कुछ सोचकर सयाली ने हामी भर दी।राजेश ने भी सयाली के कंधों पर हाथ रखते हुए आश्वासन दिया।
सयाली का मौन ही उसे उसकी गलतियों का एहसास करा रहा था।
जाते जाते बेटे ने माँ के पैर छुए और बोला,”मम्मी मै केवल दादी को लाने जा रहा बल्कि इस घर की खुशियाँ लेने जा रहा हूँ,,, आशीर्वाद नहीं दोगी!!!
सयाली के दिमाग में उठ रहा तूफान अब तक शांत हो चुका था।उसने बेटे के सर पर प्यार से हाथ फेरते हुए आशीर्वाद दिया और बोली,”मै बहुत ग़लत थी बेटा..”।
आज सालों बाद,सयाली को अपराधबोध का एहसास हो आया था।
आज उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि मानो उसकी अपनी माँ वापस आ रही हो…जल्दी से किचन में जाकर सयाली माँ की पसन्द का खाना बनाने में जुट गई…..!!!
माँ की वापसी ने इस घर को फिर से वही पुराने दिन,वही चहल-पहल और वही खुशियाँ लौटा दी।

-अनुजा दुबे ‘पूजा’

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