इन मौन भटकते गीतों
यदि तुम वँशी का स्वर दे दो
मैं व्यथा कहूँ कैसे अपनी
उन्मन मन की क्या अभिलाषा
भावों के भटके हुये शलभ
जलना यौवन की परिभाषा
बन बिन्दु रीतते जीवन को
मधु सुधियों की गागर दे दो
भीगी पलकों की छाया में
सोये सुख सपने मचल-मचल
गन्ध भरी अमराई में
हो मत्त भृमर जैसे आकुल
सुरभि बाँध लूँ आँचल में
यदि कलियों का कोहबर दे दो
बौराई कोकिल की कुहुकन ने
छेड़ा मन के तारों को
आशा के कच्चे धागों से
बाँधा है दिन बंजारों को
मद भरी फागुनी रातों को
सपनों का सोन शिखर दे दो
अधखुली पलक की कोरों में
तिरती इक धुंधली सी छाया
अनदेखे को साकार किया
कैसी पागल मन की माया
उड़ जाये बेसुध मन पंछी
वह सिंदूरी अम्बर दे दो
-डॉ. मधु प्रधान
कानपुर
