हो न उसकी जगहँसाई, मौन ही रहना हमें,
बीते कल की याद आयी, मौन ही रहना हमें।
दर्द जब आँखों में उतरा, अश्क भी ठहरे रहे,
दिल ने फिर आवाज़ लगायी, मौन ही रहना हमें।
लोग सारे पूछते हैं, मुस्कुराने का सबब,
ज़ख्म ने जब बात छुपायी, मौन ही रहना हमें।
रात भर तन्हाइयों ने चाँद से बातें कीं मगर,
नींद भी चौखट न आयी, मौन ही रहना हमें।
वक़्त ने हर मोड़ पर ही आज़माया इस तरह,
हर खुशी फिर रूठ आयी, मौन ही रहना हमें।
अब तो ख़ुद के दर्द की ‘संवेदना’ आदी हुई,
जब ग़ज़ल होंठों पे आयी, मौन ही रहना हमें।
-रीमा सिन्हा ‘संवेदना’
(लखनऊ )
