हाथ में पतवार होगी
ये नदी भी पार होगी
धार में उतरे अगर तू
बस भँवर का ध्यान रखना
एक तिनका भी न होगा
तैरने का ज्ञान रखना
उस किनारे की ज़मीं भी
एक दिन गुलज़ार होगी
पत्थरों से फूट कर तू
प्यास तक बहता चला चल
राह में दुश्मन मिलेंगे
धुंध आँधी धूप बादल
मौत से घबरा गया तो
ज़िंदगी की हार होगी
धूप का चोला पहन कर
आँधियों पर कर सवारी
दामिनी भर कर नयन में
आज अपनी खेल पारी
जंग में मुट्ठी कसी तो
जीत का आधार होगी
-संध्या सिंह
