योग मन की अवस्था है, समयबद्ध व्यायाम नहीं

आज 21 जून, अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर विश्वभर में करोड़ों लोग योगासन और प्राणायाम का अभ्यास करेंगे। यह निस्संदेह एक स्वस्थ और स्वागतयोग्य परंपरा है।

किन्तु योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं है।

यदि योग चटाई पर शुरू होकर वहीं समाप्त हो जाए, तो वह केवल एक फिटनेस अभ्यास बनकर रह जाता है। भारतीय ऋषियों ने योग को जीवन जीने की एक कला के रूप में देखा था—आंतरिक संतुलन, सजगता और आत्मानुशासन की अवस्था के रूप में।

कोई व्यक्ति सभी योगासन करने में निपुण हो सकता है, फिर भी भीतर से अशांत, क्रोधित या चिंताग्रस्त रह सकता है। दूसरी ओर, कोई व्यक्ति योगासन न भी करता हो, पर यदि वह संयम, करुणा, धैर्य और आत्मिक शांति के साथ जीवन जीता है, तो वह योग की वास्तविक भावना के अधिक निकट है।

भगवद्गीता योग को “समत्व” कहती है—सुख-दुःख, सफलता-असफलता, प्रशंसा-आलोचना में संतुलित बने रहने की क्षमता।

🕉️ योग वह नहीं है जो हम एक घंटे करते हैं; योग वह है जो हम पूरे दिन जीते हैं। योग का वास्तविक माप शरीर की लचक नहीं, बल्कि मन की शांति है।

– कृष्णगोपाल शर्मा

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