ना हो रिश्तो में सामंजस्य तो,
ज़िन्दगी ही बदल जाती है।
किसी किताब के बिखरे पन्नों सी,
ज़िन्दगी भी बिखर जाती है।
श्रद्धा और शिद्दत से निभाएं तो,
हर रिश्ते में ईश्वर की झलक आती है।
शब्दों में थोड़ी मधुरता घुल जाए तो,
बिगड़ी हुई बात भी बन जाती है।
कड़वाहटों में क्या पाना रखा है,
स्नेह संग रहने से ही मधुरता आती है।
प्यार से सहेजकर रखें इसे हम तो,
ये परिवार ही सबसे बड़ी पूंजी कहलाती है।
विश्वास की ड़ोर पक्की अगर हो,
कोई लाख तोड़ना चाहे मगर ये टुट ना पाती है।
एक तरफा रिश्तों को निभाया जा नहीं सकता,
परस्पर अनुराग से नातों में दृढ़ता आती है।
मुक्ति भंडारी ‘ममता’
