रेगिस्तान बनाते मन को

एक नवगीत ….

रेगिस्तान बनाते मन को ,
रीते घड़े दुपहरी में ।

धूप सवेरे से ही आती है ,
किरणों के पर खोले ,

गुलमुहरी आकाश तले,
मुठ्ठी भर छाया मुँह बोले ,

अपराधी से दिवस खड़े ,
गरमी की खुली कचहरी में ।

पँख हवा के जले जले ,
घुँघरू बजते अँगारों के ,
लपटों की गलबहियाँ डाले ,
जिस्म थकी मीनारों के ,

दिन की गरम रात की ठंडी ,
साँसें घुलीं मसहरी में ।

-कमलेश श्रीवास्तव

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