घर की नींव के अंदर होना,
सीख रहा हूँ पत्थर होना।
सूरज बन कर कहाँ है आसाँ,
सारी उम्र मुनव्वर होना।
दूरी रखकर मिलना सबसे,
फिर भी बहुत मोतबर होना।
बाहर बनना एक सिकन्दर,
अंदर एक कलन्दर होना।
हर दरिया का पीकर पानी,
मुझको नहीं समंदर होना।
जलना इक चराग़ आँधी में,
यही मोजज़ा अक्सर होना।
दुश्मन होते हुए उम्र भर,
यारों से भी बेहतर होना।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
