लगे सजाने वर्तमान को
लेकर फिर
कीचड़ अतीत की
लेकिन जहाँ-जहाँ जायेंगे
संवेदन ही आहत होगा !
कहीं-कहीं
लथपथ पायेंगे
सनी खून से हुई चेतना
कहीं क्रूरता के
प्रकोप में
मिले चीखती हुई वेदना
उत्पीड़न के
साक्ष्य मिलेंगे
अपनापन ही विक्षत होगा !
कहीं उठाकर हाथ
प्रतिज्ञा
नये-नये संकल्प करेगी
उद्घोषों के
महाशोर में
आतंकी हुंकार भरेगी
नियम-विरुद्ध
आचरण कब तक
व्यवहारों में संगत होगा !
कल का बोया
आज कट रहा
अब का बोया कभी कटेगा
यह निश्चित है
परदा सच से
देर-सबेर जरूर हटेगा
जो भी सच के
लिए खड़ा है
साथ उसी के जनमत होगा !
-जगदीश पंकज
