नन्हें नन्हें कोमल मृदुल पाँव से
लौटा मेरा बचपन नन्हें गाँव से ।
मन अब भी अटका पर मेरा
नदी नाव की माया में ।
सती मात के टीले की ,
बरगद वाली छाया में ।
नींदें अब भी खुलती मेरी
कौओं की काँव काँव से ।
सुबह सुबह घट्टी की घड़ घड़
धान फटकता सुपडा ।
खपरैलों से उठता धुँआ
कहीं नहीं है दुखड़ा ।
नोन मिर्च संग रोटी खबती
देखो कितने चाव से ।
पनघट पर चूड़ी की खन खन
गाती गीत प्रभाती ।
दूध दुहाती गैया के संग
बछिया खूब रंभाती ।
पशु पक्षी सब चारा खाते
पीते पानी हलाव से ।
करके कलेवा चल निकले हैं
खेत जोतने हाली ।
थोड़े दिन के बाद दिखेगी
सोने जैसी बाली ।
चेहरे पर आएगी खुशियाँ
बिके धान के भाव से ।
शादी -ब्याह तीज़ -तिवार सब
खेती के आधारे ।
प्रकृति और प्रभु की किरपा
के आगे सब हारे ।
मान मनौवल सब ले लेंगे
हम तो भक्ति भाव से ।
खोज रहा हूँ कहाँ बचा है
मेरे बचपन का गांव ।
प्रकृति से जुड़ा रहता था
जिसका इक इक ठांव ।
नुचे लूटे हुए हैं अब सब
शहरीपन के घाव से ।
-हृदयेश भारद्वाज
