“ऐ जिंदगी जरा ठहर,
थोड़ा तो सुस्तालें,
कुछ पल सुकून के गुजार लें।
ऐ जिंदगी जरा ठहर,
तू भी है थकी-थकी,
हम भी हैं थके-थके,
चल जरा दो पल,
किसी पेड़ की,
ठंडी छाँव में गुजार लें।।
कुछ पल—
ऐ जिंदगी जरा ठहर,
तू सदा,
दो दूनी चार,चार दूनी आठ,
के जोड़-तोड़ में फँसी रहेगी,
चल जरा,
इस चक्रव्यूह से बाहर निकल,
कुछ पल,
इस शांत दरिया के किनारे गुजार लें।।
कुछ पल—–
ऐ जिंदगी जरा ठहर,
मन बहुत घबराता है,
इस शहर के तीखे शोर,
और आदमी की कर्कश वाणी से,
चल जरा कुछ पल,
किसी बागीचे में,
पक्षियों की कलरव ध्वनि,
के बीच में गुजार लें।।।
कुछ पल—–
ऐ जिंदगी जरा ठहर,
होने लगीं हैं सर्द रातें भी,
आ चल,
सुबह की गुनगुनी धूप में,
दो पल सुकून के गुजार लें।।।
ऐ जिंदगी जरा ठहर,
थोड़ा तो सुस्तालें,
कुछ पल सुकून के गुजार लें”।।।
-साधना छिरोल्या
दमोह(म.प्र.)
