विष-बेल

(व्यथा)

खुले कैदखाने में,
दीवारें न थीं कॉन्क्रीट की।
न थीं पैरों में बेड़ियाँ,
न ज़रूरत थी चौकीदार की।

दिल हाइजेक था,
दिमागों पर लगी थी बेड़ियां।
नशे में धुत्त सभी,
अहसास नही, ये गुलामी थी।

आया था एक,
छद्म शासन,बताने आजादी।
उसके प्रयास का,
अंजाम हुआ अदृश्य गुलामी।

कहते लोकतंत्र जिसे,
दिलों में रंजिश थी आपसी।
संग रवांडा रेडियो,
नफरत की हुई थी वापसी।

विष वमन करते,
जिनमें विष नही था कभी।
दिल से दिमाग तक,
यह विष-बेल विकराल हुई।

चेत जा मनुज तू,
जड़ से काट दे विष-बेल को।
लिखेगा इतिहास,
इंसानियत का मिसाल था तू।

-सुरेश गुप्ता

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