बात 1980 की है। हम छोटे से शहर इलाहाबाद में रहते थे। उस समय इलाहाबाद अपने, विश्व विद्यालय, हाई कोर्ट, राजनीतिक गतिविधियों , साहित्यकारों, माघ मेले, कुम्भ मेले के कारण विश्व पटल पर मशहूर था। पर जन संख्या बहुत कम थी।
छोटा शहर होने के कारण लड़के लड़कियों के मेलजोल पर अघोषित पाबन्दी थी। अधिकांश स्कूलों में को एजुकेशन नहीं थी। विश्व विद्यालय तक पंहुचने तक अधिकांश लड़कियों की शादी हो जाती थी। प्रेम पत्र लिखने की नौबत नहीं आती थी।
उन दिनों शादी अधिकतर मां बाप तय करते थे। लड़के लड़कियों को फोटो दिखा दी जाती थी। बताइये यह भी कोई बात होती है कि किसी लड़की को एकदम अजनबी के पल्ले बांध दिया जाए। मैं सोचती अपने होने वाले पति को प्रेम पत्र लिखूंगी उसके भी प्रेम पत्र आयेंगे, इत्र लगे। मैं सहेज कर रखूंगी।
मेरे मां बाप काफी हद तक खुले विचारों के थे। उन्होंने मुझे कह रखा था शादी तुम्हारी पसंद से ही होगी। मैं नौकरी में आ चुकी थी। मां ने मुझे मेरे होने वाले वर को देखने का मौका दिया। उन्होंने एक नज़र में मुझे पसंद कर लिया। मैं शर्म के मारे ठीक से देख भी न पाई। जब मुझे पता चला कि वो लोग शादी के लिए तैयार हैं तब मैंने अपनी अंतरंग सहेली से सब बात की। उनसे पूछा मैंने तो ठीक से देखा तक नहीं शादी के लिए हां कैसे कर दूं। वो मेरे साथ उनकी दुकान तक जाने को तैयार हो गईं। हम ग्राहक बन कर पंहुचे। मैंने जब अपने होने वाले पति को देखा लगा इनसे पहले का नाता है। तुरंत पसंद कर लिया। मां को हां में जवाब दे दिया। उन्होंने शगुन देकर रिश्ता तय कर दिया। मेरे होने वाले पति बेझिझक मुझसे मिलने आने लगे। जब मुलाकातें ही होने लगीं तब प्रेम पत्र लिखने का कोई औचित्य ही नहीं रहा। हमने वो पहला प्रेम पत्र कभी लिखा ही नहीं।
मां बाप ने अति शीघ्र शादी ही कर दी कि कहीं मैं बदनाम न हो जाऊं। हमें एक दूसरे से विवाह पूर्व मिलने के अधिक अवसर ही नहीं मिले।
आज भी लगता है जैसे वो सब कल की बात है। बिना प्रेम पत्र लिखे ही हमने साथ साथ एक लम्बा प्यार भरा जीवन साथ बिताया।
-कामिनी हजेला
