शर्त इतनी-सी है ख़ुशी के लिए,
दिल न खोला करो सभी के लिए।
वो जो रिश्तों में धूप बोते थे,
घर बचाते फिरे नमी के लिए।
जिस्म मिट्टी का था मगर हमने,
ख़ुद को पत्थर किया ख़ुदी के लिए।
अपने हिस्से की आग पी मैंने
लोग बैठे रहे नदी के लिए।
अपनी आँखों में राख भर कर भी ,
दिल सँवारा है रोशनी के लिए।
हमने चाहा था घर बचे हर हाल,
लोग लड़ते रहे ज़मीं के लिए।
लोग रिश्तों को तोड़ देते हैं,
सिर्फ़ थोड़ी-सी बेरुख़ी के लिए।
-रूबी झा ‘कमल’
