नीरव तट
जल से लबरेज नदी,
जैसे भीतर तक
गहरे सुकून से भरी हो कोई आत्मा,
पानी की सतह पर
थिरक रही है एक धीमी हलचल।
किनारे पर खड़ा है
वह निपट अकेला वृक्ष,
जिसकी फैली बाहों के पीछे से
ढलता हुआ सूर्य
चुपके से झाँक रहा है,
जैसे विदा लेने से पहले,
मुस्कुराकर अलविदा कह रहा हो।
पूरे आकाश में
बिखरी हुई है सुनहरी किरणें
स्वर्ण सा चमक रहा है नीर
और आभासित है क्षितिज,
प्रकृति ने ओढ़ ली है
एक जादुई मलमल-सी चादर।
दिनभर की उड़ान समेट,
लौट आए हैं पंछी अपने नीड़,
शाखों से अब
चहचहाहट नहीं,
बस एक गहरी तृप्त खामोशी
छन-छनकर करीब आ रही है।
यही वह पल है
जब सब कुछ
ठहर सा गया है इस सुनहरी शाम में,
नदी का बहना,
सूरज का ढलना,
और तभी
नियति ने लिख दिया
तुम्हारा इन्तजार करते-करते
बस मौन होकर मेरा
आत्मलीन हो जाना।
-प्रदीप कुमार अरोरा
