मोहन की मनमोहक मूरति
सांवरि सूरति श्याम सलोने।
बंसी की धुन बाजत नाचत
झूम उठे वन बाग के कोने।
एक ही पग पर ठाढे रहे प्रभु
पय को पिए प्रभु भरि भरि दोने।
मैया यशोदा ज्यो टीको लगावत
लल्ला को लागे ना काहू को टोने।।
-विन्ध्य प्रकाश मिश्र ‘विप्र’
प्रतापगढ़ (उत्तरप्रदेश )
