संवेदनहीन होता समाज : कारण और समाधान

आखिर हो क्या गया है हमारे समाज को? आज चारों ओर से आत्महत्या, अवसाद और निराशा की खबरें सुनने को मिल रही हैं। क्या सचमुच जिंदगी इतनी सस्ती हो गई है? या फिर हमारा समाज धीरे-धीरे संवेदनहीन होता जा रहा है, जहाँ लोगों के पास दूसरों के दुःख-दर्द को समझने और सुनने का समय ही नहीं बचा है?
जिस देश के वेद-पुराणों में यह शिक्षा दी जाती है कि—
“धैरज धरहूँ त उतरहूँ पारा।”
अर्थात् जो व्यक्ति कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य से काम लेता है, वह अंततः सफलता प्राप्त करता है। ऐसे देश में आज लोग छोटी-छोटी समस्याओं से घबराकर जीवन से हार मानने लगे हैं। इसका एक प्रमुख कारण यह भी है कि समाज में आपसी संवाद, अपनापन और संवेदनाएँ कम होती जा रही हैं। लोग एक-दूसरे के दुःख को समझने के बजाय स्वयं में इतने व्यस्त हो गए हैं कि निराश और अकेला व्यक्ति सहारे के अभाव में टूटने लगता है।
यह जीवन हमें ईश्वर की अमूल्य निधि के रूप में प्राप्त हुआ है। हमें इसकी खूबसूरती को महसूस करना चाहिए। जिस प्रकार कोई भी मार्ग पूरी तरह समतल नहीं होता, उसी प्रकार जीवन में भी अनेक उतार-चढ़ाव आते हैं। ऐसे समय में हमें धैर्य, विश्वास और साहस के साथ आगे बढ़ना चाहिए, न कि अपने जीवन का अंत करने जैसा गलत निर्णय लेना चाहिए।
कहा भी गया है—
“जब खुद से न सुलझें तेरे उलझे हुए धंधे, भगवान के इंसाफ पर सब छोड़ दे बंदे।”
ईश्वर कभी किसी को गिरने नहीं देते, जब तक हम उन पर अपना विश्वास बनाए रखते हैं। फिर हम क्यों क्षणिक परेशानियों के कारण स्वयं ही अपने जीवन का अंत करने का निर्णय लेने लगते हैं? क्या जीवन समाप्त कर लेने से समस्याओं से मुक्ति मिल जाती है? और हमारे बाद हमारे माता-पिता, भाई-बहन तथा परिवार के अन्य सदस्यों का क्या होगा? क्या हमने कभी इस विषय में गंभीरता से सोचा है?
समस्याओं से भागना समाधान नहीं है, बल्कि उनका साहसपूर्वक सामना करना ही सच्ची जीत है। आवश्यकता इस बात की है कि हम एक-दूसरे के प्रति संवेदनशील बनें, लोगों की बातें सुनें, उनके दुःख में सहभागी बनें और उन्हें भावनात्मक सहारा दें। परिवार, मित्र और समाज यदि प्रेम, अपनापन और सहयोग का वातावरण प्रदान करें, तो अनेक लोगों को निराशा के अंधकार से बाहर निकाला जा सकता है।
आइए, आज हम एक जागरूक नागरिक होने का कर्तव्य निभाएँ और स्वयं से यह वादा करें कि चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, हम उनका साहसपूर्वक सामना करेंगे और दूसरों के जीवन में आशा और विश्वास का दीप जलाने का प्रयास करेंगे।
माना कि रास्ते और मंजिल के बीच फासले बहुत हैं, हार नहीं मानना है क्योंकि हममें हौसले बहुत हैं।
लोगों से मिलिए, मित्र बनाइए, रिश्तों से दूरियाँ मिटाइए, खुद भी जी लीजिए, और दूसरों के जीने की भी वजह बन जाइए।
यकीन मानिए, यदि हम अपने भीतर संवेदनाओं को जीवित रखें, एक-दूसरे के दुःख को समझें और प्रेम तथा सहयोग का हाथ बढ़ाएँ, तो यह संसार और भी सुंदर बन सकता है। रोज सुबह आईने में स्वयं को देखकर मुस्कुराइए और इस मुस्कान को सबमें बाँटिए।
यह जीवन ईश्वर की अनमोल देन है। इसकी रक्षा करना और इसे सार्थक बनाना हम सभी का कर्तव्य है। आइए, एक संवेदनशील समाज का निर्माण करें, जहाँ हर व्यक्ति को जीने का सहारा, सुनने वाला कान और समझने वाला दिल मिले।
फिर देखिए, यह जिंदगी कितनी सहज, सुंदर और अनमोल बन जाएगी।

-रीति झा

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