कल शाम की ही बात है। बाहर, बीच सड़क पर एक मोटरसाइकिल सवार युवक फिसलकर गिर पड़ा। वह दर्द से कराह रहा था, लेकिन व्यस्त सड़क पर दर्जनों गाड़ियाँ बिना रुके गुज़र गईं। कुछ लोगों ने स्मार्टफोन निकाले, तस्वीरें लीं—शायद सोशल मीडिया पर डालने के लिए—और आगे बढ़ गए। अंततः, एक ठेले वाले ने आकर उसे संभाला।
इस दृश्य ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया। जिस संस्कृति में ‘परहित सरिस धरम नहिं भाई’ की गूँज थी, वहाँ आज दूसरों का दुःख केवल एक ‘तमाशा’ बनकर क्यों रह गया है?
कारण :
तकनीक ने हमें दुनिया भर से तो जोड़ दिया, लेकिन पास बैठे इंसान से दूर कर दिया। आज लोग वास्तविक संवेदना जताने के बजाय सोशल मीडिया पर एक ‘इमोजी’ भेजकर औपचारिकता पूरी कर लेते हैं। आज की जीवनशैली ‘मैं, मेरा और मुझे’ के इर्द-गिर्द सिमट गई है। भौतिक सुखों की अंधी दौड़ में इंसान इतना व्यस्त है कि उसके पास दूसरों की पीड़ा महसूस करने का समय ही नहीं है।
एकल परिवारों और महानगरीय संस्कृति ने हमें कंक्रीट के जंगलों में अकेला कर दिया है। पहले जो सामूहिक चेतना और सहानुभूति संयुक्त परिवारों में स्वतः अंकुरित होती थी, वह अब खो रही है।
निदान :
संवेदनाओं के पुनर्जीवन का मार्ग संस्कारयुक्त शिक्षा ही इसका मार्ग प्रशस्त कर सकती है। शिक्षा केवल जीविकोपार्जन का साधन न बने। परिवारों और विद्यालयों में बच्चों को ‘सहानुभूति’ का व्यावहारिक पाठ पढ़ाया जाए।
हमें तकनीक और मानवीय संबंधों में संतुलन बनाना होगा। दिन का कुछ समय ऐसा हो, जब परिवार के लोग बिना किसी स्क्रीन के साथ बैठें और एक-दूसरे के सुख-दुःख साझा करें।
साहित्य मनुष्य को संवेदनशील बनाने का सबसे सशक्त माध्यम है। नई पीढ़ी को वैचारिक और भावनात्मक रूप से समृद्ध करने के लिए कला और किताबों से जोड़ना अनिवार्य है।
समाज हमसे ही मिलकर बनता है। यदि समाज संवेदनहीन हो रहा है, तो इसका अर्थ है कि हमारे भीतर की मनुष्यता सो रही है। अगली बार जब कोई संकट में दिखे, तो तस्वीरें लेने के लिए हाथ जेब में न जाएँ, बल्कि मदद के लिए आगे बढ़ें। संवेदना का एक छोटा-सा प्रयास भी समाज का अंधेरा दूर कर सकता है।
-डॉ. संगीता बिंदल
