बहुत से लोगों की आदत होती है कि वे हर समय समय का रोना रोते रहते हैं। कहते हैं, “इतना सब कैसे करें? समय ही नहीं मिलता।” जबकि समय तो सभी के पास चौबीस घंटे का ही होता है, न कम और न अधिक। जिन लोगों ने अपने जीवन में सफलता प्राप्त की है, उन्होंने कभी समय का रोना नहीं रोया। उन्होंने अभावों में जीवन जिया, कठिन संघर्ष किया और अपने प्रयासों से ऊँचा मुकाम हासिल किया।
यह पूरी तरह हम पर निर्भर करता है कि सभी कार्य समय पर पूरे करने के लिए हम समय-प्रबंधन किस प्रकार करते हैं। कुछ लोग अपना अधिकांश समय यही सोचने में बिता देते हैं कि यह काम कल कर लेंगे, लेकिन वह “कल” कभी नहीं आता।
नौकरीपेशा लोगों की शनिवार और रविवार को छुट्टी होती है। अस्पताल में दिखाना हो, जाँच करवानी हो, बैंक का काम हो, घर का राशन लाना हो या फोटोस्टेट करवानी हो, वे घर से ही सभी कार्यों की सूची बनाकर निकलते हैं और एक साथ सारे काम पूरे कर लेते हैं। कुछ लोग अपनी पूरी टू-डू लिस्ट बनाकर रखते हैं कि आज कौन-कौन से कार्य करने हैं। वे प्राथमिकता के अनुसार उन पर क्रमांक भी अंकित करते हैं। परिणामस्वरूप न तो कार्यालय का कोई कार्य लंबित रहता है और न ही घर का।
बच्चों को लेकर कहीं घूमने जाना हो या किसी यात्रा पर जाना हो, तो उसकी योजना भी वे पहले से बना लेते हैं। आवश्यक कार्यों की सूची तैयार करते रहते हैं और जो भी नया कार्य याद आता है, उसे उसमें जोड़ देते हैं। इस प्रकार उन्हें किसी भी कार्य को पूरा करने में कठिनाई नहीं होती और अनावश्यक सोच-विचार में समय भी व्यर्थ नहीं जाता।
रिश्तेदारी में कहीं जाना हो, तो उसे भी वे अपनी प्राथमिकताओं में शामिल करते हैं, क्योंकि जीवन में रिश्ते निभाना भी उतना ही आवश्यक है।
आज मोबाइल के युग में रिश्ते वैसे ही सिमटते जा रहे हैं। निमंत्रण-पत्र भी व्हाट्सऐप पर भेज दिया जाता है और सामने वाले को यह बताने के लिए फोन तक नहीं किया जाता कि आपको निमंत्रण भेजा गया है।
ऐसे लोगों के पास शिकायत करने के लिए तो बहुत समय होता है, पर जो समय व्यर्थ की बातों में निकल गया, वह क्या कभी लौटकर आ सकता है?
हमें अपने परिवार के साथ-साथ समाज को भी प्राथमिकता देनी चाहिए। कई बार अचानक रिश्तेदारी या पड़ोस में ऐसी परिस्थिति आ जाती है, जब किसी की देखभाल हमारी प्राथमिकता बन जाती है। उनके बच्चे विदेश में रहते हैं, तो उन्हें अस्पताल कौन ले जाएगा? ऐसे समय में बहाने खोजने के बजाय स्वयं आगे बढ़कर सहायता के लिए तत्पर रहना ही मानवीय कर्तव्य है।
अंततः सत्य यही है कि हमारे पास समय का अभाव नहीं है। हम अपनी प्राथमिकताएँ स्पष्ट रूप से तय नहीं कर पाते, इसलिए समय की कमी का रोना रोते रहते हैं।
मैंने नौकरी में रहते हुए बिना समय का रोना रोए किस प्रकार रिश्तेदारों और पड़ोसियों की सहायता की, उसके बारे में कभी मुक्त दिवस पर अवश्य लिखूँगी।
-राधा गोयल
विकासपुरी (दिल्ली)
