जब चलें बेख़ौफ़ आंधियां
पकड़कर रखो अपनी जमीन
और खड़े रहो मजबूती से।
वरना उड़ जाओगे।
बचा सको, तो बचा लो
अपनी गैरत, अपना ईमान।
चारों ओर घूम रहे हैं
झूठ के सौदागर।
अनैतिकता परवान पर है
नैतिकता धूल चाट रही है।
दिलो-दिमाग पर हावी है हैवानियत
और दम घुट रहा है इंसानियत का।
खो गयी है मर्यादा, ज़ुबान और शब्दों की
आम-ओ-ख़ास हो चली है, बदतमीजी।
खत्म हो चुकी है राजनीति से ‘नीति’
बचा है सिर्फ ‘राज’, जो चल रहा है।
कलंकित, महिमामंडित हो रहे हैं
और दुर्भिक्ष है, चरित्र का।
खूब उड़ाओ आसमान में गुब्बारे
और दौड़ते रहो, टूटती पतंगों की ओर!
-विजयानंद विजय
नयी दिल्ली
