सम्मान

महाकवि ने अपने अनुयायियों से कहा “ लेखकों, शारदा के वरद पुत्रो! मेरी बात उतने ही ध्यान से सुनो जितने ध्यान से तुम सब ‘मन की बात’ सुनते हो!” माई की कृपा से तुम्हारी साधना अच्छी चल रही है। ऊपर से मेरी असीम अनुकम्पा और आशीर्वाद तुम सब पर एक साथ खूब फल फूल रहा है।
साधना के लिहाज से, तुम्हें एक ही बात का खास ख्याल रखना है कि तुम्हें किसी भी किस्म के सम्मान की अपेक्षा कम से कम मेरे जीते जी नहीं करना है।”
“पद्म और ज्ञानपीठ से लेकर अकादमी स्तर के लगभग सभी सम्मानों को झटकने और लपकने के लिए अभी तुम्हारे गुरू की बूढ़ी टांगों और कंकपाते हाथों में अपार बल है।”

“अपनी साधना में निमग्न रहो भगवान तुम्हारा भला करेंगे।”
“सुबह-शाम मंत्रों की, छंदों की अघोर साधना करो और हाँ, अपनी निगाहें सदैव नीचे रखना। यह भी एक प्रकार का दृष्टि संयम है।”
उन्होंने अपने शिष्यों को घूरते हुए हिदायत के अंदाज़ में समझाते हुए कहा; समझे!
“देश और दुनिया के ज्वलंत मुद्दे हमारी एकाग्र साधना और ध्यान को कटी पतंग की भांति भटकाते हैं, हमें एकाग्र नहीं रहने देते, इसलिए बेहतर तो यही है इन सबसे विरक्त होकर मन को साधना में रमाया जाय। वैसे भी अपने समय के सरोकारों से कटे रहने में , तुम्हारी ही नहीं मेरी भी भलाई है।”

भक्तमाल शतक से एक वैराग्य वर्धक भजन राग शिवरंजनी में सुनाया।
“ऐसा करते रहने से अपेक्षाकृत छंदों की सिद्धि जल्दी हो जाती है। तुम सब भी मेरी ही तरह एक दिन मुझ से भी बड़े गुरु घंटाल बन जाओगे।”
“शेष कामों के लिए मैं हूँ।”
सुनते ही अंधभक्त अनुयायियों ने अपनी गर्दनें शुतुरमुर्ग की मानिंद नीचे लटका लीं और मगन होकर कीर्तन करने लगे।

कहते हुए गुरुदेव ने भक्तों को भक्तमाल शतक से एक वैराग्य वर्धक भजन राग शिवरंजनी में सुनाया।
“ऐसा करते रहने से अपेक्षाकृत छंदों की सिद्धि जल्दी हो जाती है। तुम सब भी मेरी ही तरह एक दिन मुझ से भी बड़े गुरु घंटाल बन जाओगे।”
“शेष कामों के लिए मैं हूँ।”
सुनते ही अंधभक्त अनुयायियों ने अपनी गर्दनें शुतुरमुर्ग की मानिंद नीचे लटका लीं और मगन होकर कीर्तन करने लगे।

-मनोज जैन
भोपाल

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