साठ का है बाप वय में
और बेटा बीस का।
हैं अलग दोनों धरातल
पर समय की आँच में
पककर बनें पक्के घड़े।
युद्ध में योद्धा सरीखे
जीतने की कामना से
जब मिले दोनों लड़े।
बीच में आकर खड़ा है
आंकड़ा छत्तीस का।
जोश में रफ़्तार ज्यादा
और अनुभव में दिखाई
दे रहा ठहराव है।
शोर है तूफान जैसा और
इस तूफान से सटकर
खड़ी क्यों नाव है।
फैसला स्वीकार होगा
समय न्यायाधीश का।
यह कहानी आपकी है
और मेरी मान लो यह
एक सी ही है।
दर्द में डूबे हुए हर आदमी
की आँख देखें कुछ
नमी सी है।
हल हमें ही ढूँढ़ना इस
कसमसाती टीस का।
-मनोज जैन
