हर ज़ख्म-ए-तमन्ना से उभरने का हुनर सीख
मंज़िल है तेरे सामने चलने का हुनर सीख
क्यों दौड़ता फिरता है तू बेकार जहां में
कुछ काम ख़मोशी से भी करने का हुनर सीख
हो जायेगी वो मोम भी उल्फ़त में तुम्हारी
पहले तो ज़रा तू भी पिघलने का हुनर सीख
आंसां नहीं जज़्बात को लफ़्ज़ों में पिरोना
कहनी है कोई बात तो कहने का हुनर सीख
आ जायेगा ख़ुद प्यार भी करना तुझे इक दिन
पहले तू किसी दिल में उतरने का हुनर सीख
– नमिता राकेश
