तोड़ बंधन सारे उन्मुक्त हो,
शिव की जटा से बहकर आना
सुनो हे भागीरथी!
आकाश से धरती तक फैली है
नफरत की ज्वाला
शांत हो ऐसा एक परिवेश ले आना।
बहा ले जाना दुनिया के
सारे द्वेष, हिंसा और नफरत को
दे जाओ एक शांत
सु-गंभीर, सुललित पृथ्वी को
बहा ले जाओ द्रौपदी के
चीरहरण की कड़वी स्मृतियाँ
बहाले जाओ
महाभारत से उपजे अनल को
बहा ले जाओ विष का प्याला तुम
दे जाओ एक सुगठित
शान्ति की प्रतीक को।
नफरत के अनल में दग्ध हो रही है पृथ्वी
सूरज भी बरसा रहा है
अग्नि की आहुति
तोड़ बंधन सारे उन्मुक्त हो आना
धरती की गोद में जो थी
तुम कभी शांत, पवित्र निम्नगा
वह अब मलीन हो गई है,
एक नये रूप से
अपने हक के लिए लड़ने आना
सीता की सहनशीलता प्रश्न उठ रहे हैं
एक स्त्री के अस्तित्व का हार हुआ है
उन स्मृतियों को भी बहा ले जाना
एक नये रूप से
अपना अस्तित्व को बचाने आना
सुनो हे भागीरथी!
एक नया संदेश तुम ले आना
आँचल से तुम्हारे फिर अमृत बरसाना
जीवन के कलश से जल हमें पिलाना
हे भागीरथी! शिव की जटा छोड़ लौट आना।
सुनो हे भागीरथी! शिव की जटा से
उन्मुक्त हो आना।
-लतातेजेश्वर ‘रेणुका’
