पीतल की स्वर्णिम सी गागर,
कंचन सी है गोरी की काया..
गागर तो मुई शांत सी है,
पर गोरी का यौवन छलका जाए..
तीक्ष्ण नासिका सुंदर सा मुखड़ा,
कुंतल केश कपोलों में करें किलोल..
रंग-रंगीला बाना गोरी का,
खन-खन बाजे चुड़ला उसका..
रूप-यौवन का ये है सागर,
नहीं इसका कोई है सानी..
सूना पनघट भी करे विचार,
क्यों ना दिखते बंदे दो-चार..
आभामंडल गोरी का है ऐसा,
कोई उसमें ठहर ना पाए..
एक अकेली यही है काफी,
पूरा पनघट खुद सज जाय..
बात इतनी सी पनघट ना समझे,
कोई तो जाकर उसको समझाए..
-एड. सुषमा अग्रवाल
नागपुर (महाराष्ट्र)
