(मनहरण घनाक्षरी काव्य)
टूटा हमारा घोंसला,वादा क्रांति का खोखला।
कौन सूने कैफियत,बेजुबानों की यहां।
खिली हुई हरियाली,कुल्हाड़ी उसी पे चलीं।
कौन सूने शिकायत,बेजुबानों की यहां।
उड़ गए पंछी सारे,कहां जाएं वो बेचारे।
कैसी हुई रुखसत,बेजुबानों की यहां।
नन्ही-सी प्यारी चिड़िया,मौन हुई कोयलिया।
कौन करें हिफाजत,बेजुबानों की यहां।
स्वार्थी बना है ज़माना,देखें वो खुद का जीना।
कौन सूने कैफियत,बेजुबानों की यहां।
बंजर हुई है ज़मीं,आती रहेगी त्सुनामी।
सृष्टि सूने शिकायत,बेजुबानों की यहां।
मिलेगी कर्मों की सजा,देखो बदली है फिज़ा।
लगी बद्दुआ ये कैसी,बेजुबानों की यहां।
टूटा हमारा घोंसला,सृष्टि ने किया फैसला।
करें सभी हिफाज़त,बेजुबानों की यहां – –
-प्रा.गायकवाड विलास
मिलिंद महाविद्यालय लातूर
महाराष्ट्र
