सोलह श्रृंगार

अतुकांत रचना

वह आईने के सामने बैठी है
समय को ठहरा कर।
उंगलियाँ आज कैनवास हैं
और देह एक रचती हुई कविता।

माँग में सिंदूर रखती है —
सिर्फ रंग नहीं,
एक वचन है जो दो साँसों को
एक घर में बाँध देता है।

माथे पर बिंदी टिकी है,
जैसे आकाश में अकेला तारा।
चुपचाप कहती है —
मैं यहाँ हूँ, पूरी, अपने केंद्र में।

काजल की रेखा
आँखों की भाषा गहरी कर देती है।
कुछ बातें जो होठों से नहीं कही जातीं,
पलकों के किनारे लिख जाती हैं।

नथ के मोती में
हवा थमती है एक पल को।
परंपरा की डोर से बंधी
एक हल्की सी मुस्कान।

कानों में झुमके
हर कदम पर बजते हैं,
जैसे बचपन की पायल
अब औरत की लय में ढल गई हो।

गले का हार
सिर्फ सोना नहीं है,
पीढ़ियों का आशीष है
जो हृदय के ठीक ऊपर साँस लेता है।

बाजूबंद में कसी है
उसकी अपनी ताकत,
कोमल कलाई में भी
एक नदी का वेग छुपा है।

मेंहदी रची हथेलियों पर
नाम नहीं लिखती,
बस इंतज़ार की लकीरें
गहरे हरे रंग में गुनगुनाती हैं।

चूड़ियों की खनक
घर की दीवारों को बताती है
कि यहाँ जीवन है,
यहाँ उत्सव अभी बाकी है।

अंगूठियाँ उंगलियों पर
छोटे-छोटे व्रत हैं,
हर एक वृत्त कहता है —
मैंने चुना है, निभाना भी मुझे है।

कमरबंद जब कसता है
तो सिर्फ लहंगा नहीं संभलता,
संभलती है एक पूरी सदी की
मर्यादा और मर्जी एक साथ।

पायल की झंकार
धरती से बात करती है।
बताती है — मैं आई हूँ,
मेरा होना भी एक संगीत है।

बिछुए पैरों में
चुपचाप पहरा देते हैं,
हर कदम को याद दिलाते हैं
कि राह लंबी है, पर अपनी है।

और अंत में केश —
गजरे में बंधे,
खुले,
या यूँ ही कंधे पर बिखरे।
उनमें रात बसती है,
दिन महकता है,
और एक स्त्री
अपने होने का जश्न मनाती है।

ये सोलह नहीं हैं,
सोलह बहाने हैं
खुद से मिलने के।
श्रृंगार देह का नहीं,
स्वीकार का है —
कि मैं हूँ,
और मेरा होना
एक पूरा त्योहार है।

-मंजू सरावगी मंजरी
रायपुर (छत्तीसगढ़)

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