अरे बिल्लो फुआ का एक्सीडेंट हो गया और उनकी कमर की हड्डी टूट गई है , अब शायद ही वो ज्यादा जी पायें क्योंकि वैसे भी वे अब 90 साल की हो गई है और बेटे बहू भी उन्हे लगातार परेशान करते रहते हैं। नासिक से छोटे चाचा के बेटे ने जब पारिवारिक व्हाटस्एप ग्रुप में यह मैसेज डाला तो सहसा जब पिछली यादों में डूब गए। सात बहनो की इकलौती बहन पटना के पास जमालपुर में परिवार के साथ जीवन जी रही थी। पिता के जीवन यापन के साधन सीमित थे और तभी महामारी से दो भाई असमय ही काल के गाल में समा गए। अब बिल्लो सबसे छोटी सबकी लाडली हो गई थी। समय का चक्र अपनी गति से गतिमान था। घर की परिस्थिती जैसी भी थी लेकिन मां बाबूजी दिल से अमीर थे। नाते रिश्तेदारों का आना जाना लगा रहता था। शिक्षा का अच्छा केंद्र होने की वजह से मामा, मौसी के बच्चे भी पढ़ाई करने जमालपुर में रह लिया करते थे। बहन बिल्लो के साथ-साथ सभी भाई भी उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच गए थे कि मां बाबूजी को उनके ब्याह की चिंता सताने लगी थी। बड़े भाईयों की सरकारी नौकरी लगी और सोच-विचार कर अच्छा घर देखकर दोनो का विवाह सम्पन्न कर दिया। दो दो भौजाइयो के आने से तीनो छोटे भाई तो प्रसन्नचित्त तो थे ही, सबसे छोटी बिल्लो तो मानो आसमान में झूम रही थी। पहले मां अपने घर के सारे कामकाज से मुक्त होती थी फिर बिल्लो को नहा धोकर तैयार करती थी और अब दो दो भाभियों के आ जाने से तो बिल्लो की तो जैसे लॉटरी ही लग गई थी। समय का पहिया फिर घूमा और क्षण भर में सबके बाबूजी काल के गाल में समा गए। किसी को कुछ सूझ ही नही रहा था। तीसरे नंबर के भाई विमल ने तो पिता की पहचान को आगे बढाने का फैसला किया और वह फ्री लान्सर बन कर जीवन यापन करने लगा . अब बारी थी गजेंद्र और राजेश की तो दोनो ने अपनी अपनी मेहनत से सरकारी नौकरी हासिल कर ली। गजेंद्र आयकर विभाग में निरीक्षक हो गये और राजेश हाई स्कूल में अध्यापक बनकर अपने अपने मुकाम पर निकल गए। पांचो भाईयों ने अपनी हैसियत देखकर जमालपुर के एक युवा डाक्टर से अपनी बहन बिल्लो का ब्याह कर दिया। शनैः शनैः बाकी तीनो भाइयों के भी विवाह सम्पन्न हो गए और सब अपनी गृहस्थी में मशगूल होते चले गए। अब मां की भी दिनचर्या बदल गई। जिंदगी के अच्छे बुरे दिन जमालपुर में बिताने के बाद अब वह भी एक मेहमान की तरह पांचो बेटो के साथ-साथ कुछ दिन कलकत्ता में भी गुजारने लगी वजह उसके इकलौते दामाद ने कलकत्ता में एक बड़ा सा अस्पताल खोल लिया था। बड़ा सा बंगला था, सुख के सारे साधन मौजूद थे लेकिन बिल्लो फुआ को कोई संतान नही थी । न जाने कितने पीर फकीरों को दिखाया, न जाने कितनी जगह माथा टेका लेकिन होनी को यह मंजूर ही न था कि बिल्लो फुआ मातृत्व सुख ले सके। भतीजे भतीजियो से भरा मायका बिल्लो फुआ हर गर्मी की छुट्टियां बिताने जमालपुर आ जाती थी, जमालपुर में रहने वाले भाई भतीजे उनकी आवभगत करने में कोई कसर नही छोड़ते थे। घर के नीचे भोले चाचा का चाट का ठेला तो मानो हर शाम फुआ और भतीजो के चटोरेपन से गुंजायमान होता था। फुआ के बाकी भतीजे भतीजिया इस आनंद से वंचित थे। हां, कभी कभी गोपालगंज वाले भाई के बच्चे जरूर कलकत्ता हो आते थे और बडे भाई के देहांत के बाद उनका परिवार भी कलकत्ता जाकर बस गया था तो उनका तो आना जाना लगा रहता था अपनी बिल्लो फुआ के यहां। समय भी अपनी गति से आगे बढ़ रहा था। बिल्लो फुआ भी अब साल दर साल अपने भाईयों के यहां गर्मी की छुट्टी बिताने उनके घर जाने लगी थी। हर भाई के यहां उनको मायके का प्यार तो मिलता था ही साथ साथ जब बिल्लो फुआ के पतिदेव मनोहर लाल अग्रवाल जो अपने आप को एम.एल.ए. कहलाना ज्यादा पसंद करते थे, उनकी भी अच्छी खासी आवभगत होती थी। हर भाई के यहां से विदा के समय साडी और फूफा साहब के लिये सफारी सूट का कपड़ा तो मिलता ही था, उस शहर की सबसे महंगी मिठाई के कई सारे डिब्बे भी भेंट में दिये जाते थे और टीका पत्रा अलग से, लेकिन बिल्लो फुआ का दिल कभी अपने भाई भतीजो और भतीजियो पर नही पसीजा। कलकत्ता के सस्ते चोर बाजार से सबसे सस्ते खिलौने देकर बिल्लो फुआ अपना स्नेह ऐसे ही उड़ेल जाती थी। नादान ,छोटे छोटे शहर में रहने वाले भतीजे उसी में खुश थे। अचानक आई एक राष्ट्रव्यापी त्रासदी में बिल्लो फुआ को अपनी मां के साथ एक भाई के यहां लगभग दस दिन रूकना पड़ा। राष्ट्रीय स्तर के एक नेता पर प्राणघातक हमला होने से सारे देश में कर्फ्यू लगा हुआ था। उस नेता का दाह संस्कार भी तीन दिन बाद होना तय हुआ था। जिस भाई के यहां बिल्लो फुआ रूकी हुई थी, उन्होने बच्चों की पढ़ाई के चलते अपने घर पर टीवी नही लगवाया था अतः बिल्लो फुआ अपनी मां के साथ पड़ोस के शर्मा जी के यहां टीवी देखने चली जाया करती थी। जिस दिन स्वर्गीय नेता की शवयात्रा निकलनी थी तो फुआ की भाभी ने कहा कि दीदी आज जरा जल्दी खाना खा लेना तो मैं भी पड़ोस में शवयात्रा देख लूंगी। भाभी का यह कहना बिल्लो फुआ को नागवार गुजरा और वह जोर से सबके सामने ही चिल्ला उठी कि अब तुम्हारे मरने पर ही आऊंगी। सब यह अशुभ वचन सुनकर दंग रह गए और वाकई उनकी भविष्यवाणी सही निकली। पांच महिने बाद ही उनकी यह भाभी सभी को रोता बिलखता छोड़कर महाप्रयाण कर गयी।समय अपनी गति से आगे बढ़ रहा था और उसी हिसाब से बिल्लो फुआ के भतीजे और भतीजी भी बड़े होते जा रहे थे। बिल्लो फुआ के एक देवर भी कलकत्ता में बहुत बड़े इंजीनियर थे, उनका भी भवन निर्माण का बहुत बड़ा काम था, उन्होंने न जाने क्यों ब्याह नही किया था। काम बढ़ते देख उन्होने अपनी भाभी यानि बिल्लो फुआ से कहा कि आप अपने भाईयों और भतीजो को यहां बुलाइये, हम उन्हें अपने काम में पार्टनर बना लेगे। बिल्लो फुआ ने काफी प्रयास किए लेकिन उन सबके स्वभाव को देखते हुए कोई भी सहमत नही हुआ। उधर मनोहर लाल जी ने जमालपुर में एक भतीजे के साथ मिलकर एक प्लाट ले लिया लेकिन बाद में वह भी खटाई में पढ़ गया। भाई भी उम्रदराज होते जा रहे थे और धीरे धीरे स्वर्गवासी होते जा रहे थे। एक भाई के देहांत के बाद उनकी तेरहवी में बिल्लो फुआ आई और सबका ध्यान अनायास ही उनकी तरफ चला गया। बिल्लो फुआ के दोनो हांथ में चटक सुर्ख मेहन्दी लगी थी। सब रिश्तेदार फुसफुसा रहे थे कि भाई की तेरहवी पर मेहन्दी रचे ये हांथ तो बिल्लो फुआ ने बड़ी मासूमियत से कहा कि पटना में उनकी देवरानी ने जबरदस्ती लगा दी थी। खैर, वक्त बीतता जा रहा था लेकिन किसी के मन में उनके प्रति कोई सहानुभूति नही थी। ऐसी कोई याद ही नही थी जो उनके गुणों पर प्रकाश डाल सके। सब भाईयों के स्वर्गस्थ होने के बाद उनके वंशजों ने पटना स्थित पुश्तैनी मकान को बेंचने की चर्चा शुरू हुई। सब चचेरे भाई एकमत से सहमत थे कि उस मकान जिसे खंडहर कहना ज्यादा उचित होगा, बेंच कर , आयी हुई रकम को आपस में बांट लिया जाए लेकिन तभी बिल्लो फुआ और उनके पतिदेव ने सभी को कोर्ट का नोटिस भिजवा दिया कि पुश्तैनी जायदाद में पांच नही छह हिस्से होंगे। “मरता क्या न करता” कहावत को चरितार्थ करते हुए सभी भतीजो ने आपस में सलाह करके अपनी अपनी सहमति दे दी लेकिन सबके मन में खटास आ गई थी और उस दिन पटना के रजिस्ट्रार आफिस में बिल्कुल अकेली पड़ गई धी बिल्लो फुआ……..
यादें कभी कभी करवटें बदलती है। जब मन में करवटें बदलती है तो कई यादों के कारण टीस भी उठती है।वह भी जिंदगी का एक हिस्सा है , यादे इसी तरह की अनमोल पूंजी में बदल जाती है। बिल्लो फुआ की यादों की इस बारात में सभी शामिल होना चाहते है। फैमिली व्हाटस्एप ग्रुप पर सतना से भीकू भैया अवतरित हुये, कुछ उदास, रून्धे हुये से लिखते है कि उस समय मैं भी कलकता में नौकरी कर रहा था। मेरी शादी पक्की हो गई थी और उस समय बिल्लो फुआ हमारे लिए मात्र 45 रूपयों की एक पतली सी अंगूठी गिफ्ट में दे गयी थी जबकि उस समय मैं उनका सबसे प्रिय भतीजा हुआ करता था। यादों के समंदर में गोते लगाते हुये भीकू भैया बोले कि उस समय रेल का रिजर्वेशन आन लाइन न होकर रेलवे-स्टेशन पर हुआ करता है। मेरे पापा और छोटे चाचा अपने सम्पर्को के चलते रिजर्वेशन करा दिया करते थे लेकिन हर बार फूफा जी एम.एल.ए. साहब उस दिन न जाकर दो तीन दिन बाद जाया करते थे, उनका यह ” यात्रा स्थगन कार्यक्रम ” काफी लम्बे समय तक चलता रहा। इसके अलावा जब भी फुआ फूफा जी वापस जाते तो पठौनी के रूप में साल भर का अनाज, दाल , चावल और अन्य घरेलू किराना जमालपुर से ही जाता था।
भीकू भाई के छोटे भाई मीकू भी इस मौके पर अपनी बात रखना चाहते थे। वे बताने लगे कि कैसे फूफा जी हम दोनो से दिन में दसियों बार सिगरेट मंगाया करते थे और हम दोनो भाई बिना हुज्जत किए सब काम छोड़कर सिगरेट लेने दौड़ पडते थे। बहुत कुरेदने पर मीकू और भीकू भैय्या दोनो एक साथ चिल्लाकर बोले कि उस समय हर सिगरेट लाने पर बीस पैसे बच जाया करते थे और दिन भर में एक दो रूपए इकट्ठे हो जाते थे जो उस समय एक अच्छी रकम होती थी, इन यादों के समंदर में भीकू की छोटी बहन प्रार्थना कैसे पीछे रह जाती, व्हाटस्एप मीटिंग में शामिल होते हुए वह बोली कि बिल्लो फुआ के साथ जब भी मैं चौक के बाजार जाया करती थी तो बिल्लो फुआ मनिहारी की ज्यादातर दुकानो पर लड़ झगड कर ही सामान लेती थी। अधिकांश दुकानदार तो उन्हें देखकर हांथ जोड़ लेते थे। मंदिर से आते समय भी फल सब्ज़ी मंडी से भी सबसे सस्ती सब्जी और सडे गले फल लेकर आना और हम सब बच्चो को धो पोंछकर खिलाना उनका प्रिय शगल था। मीकू ने बताया कि जब से उन्होने होश संभाला, तभी से देखते आ रहे थे कि बिल्लो फुआ तो हर बार अपने मायके में रूकती थी लेकिन जमालपुर में ही फूफा जी का मां पिताजी और कई भाईयों का संयुक्त परिवार होने के बावजूद वह भी बिल्लो फुआ के मायके यानी अपनी ससुराल में ही डेरा डाले रहते थे। हमलोग की मां- चाची बताया करती थी कि फूफा जी के मां पिताजी अपने ही लड़का बहू को अपने घर पर खाने को निमंत्रण देने आया करते थे और फूफा जी इसका पालन मरते दम तक करते रहे।
तभी व्हाटस्एप ग्रुप पर एक अनजान नम्बर से मैसेज आया कि मैं आप सबकी बिल्लो फुआ को बचपन से जानता हूं। आपके सारे पारिवारिक कार्यक्रम का गवाह रहा हूं। जहां तक मुझे याद है कि आपके घर परिवार की ऐसी कोई भी शादी अछूती नही रही जिसमें बिल्लो फुआ और उनके पतिदेव ने हंगामा खड़ा न किया हो। बाकी आप सब लोग समझदार हो । रात काफी हो गई थी, सभी परिजन यादों की इस बारात से बाहर निकल कर सपनो की दुनिया में खो जाना चाहते थे तभी अचानक मैसेज आया ” ओम शांति ओम ” सब समझ गए कि एक युग का अंत हो गया है।
(प्रस्तुत कहानी ” हमाई बिल्लो फुआ ” एक काल्पनिक कथा है )
-डा.संदीप नारद
इंदौर (म.प्र.)
