गौरी ने
शिव से कहा था –
छोड़ो यह अनंत आकाश
धरती की ओर देखो।
भीख से नहीं
बीज से भरता है भविष्य।
अपने लट्ठ को हल बनाओ
त्रिशूल को फाल
और नंदी की पीठ पर
ऋतुओं का विश्वास जोत दो।
जटाओं में बहती गंगा से
खेतों की प्यास बुझाओ –
तब शायद
आक-धतूरे के फूल भी
चंपा की तरह महकने लगें।
विद्यापति जानते थे
कि गरीबी केवल
अन्न के अभाव से
नहीं आती –
वह आती है
जब हाथ
अपने ही श्रम से
विमुख हो जाते हैं।
वे लिखते हैं –
बैठे रहने से
किसी को निधि नहीं मिलती।
और उसी समय
वे बीजों की मित्रता भी
लिखते हैं –
एक किसान
दूसरे किसान को
धान की जातियां भेजता है
मानो
धरती का सबसे बड़ा ग्रंथ
डाकिए की थैली में रखा हो।
लेकिन इतिहास की मेड़ पर
बाढ़ आई,
सूखा आया
लुटेरे आए
और सबसे अंत में आया
वह समय
जब खेत से पहले
किसान का मन उजड़ा।
मैं भी
उसी मिट्टी से निकला हूं
जहां हर की मूठ
हथेली की रेखा होती थी।
फिर आए
ट्रैक्टर,
हार्वेस्टर,
थ्रेसर
नई किस्मों के बीज
रासायनिक वादे
और योजनाओं के
चमकदार काग़ज़।
सब कुछ बदलता गया –
सिवाय
उस किसान की आंखों के
जो हर मौसम में
आकाश का
चेहरा पढ़ता रहा।
आज
सबसे उपजाऊ
ज़मीन पर भी
एक डर उग आया है।
किसान का बेटा
खेत की ओर नहीं
शहर की बस की ओर
देखता है।
उसे लगता है
कि मिट्टी अब
रोटी नहीं
सिर्फ़ स्मृतियां उगाती है।
शायद
हमें फिर से सुननी होगी
गौरी की वही पुरानी सलाह-
कृषि केवल पेशा नहीं
सभ्यता का सबसे विनम्र
उच्चारण है।
जिस दिन
हल की आवाज़
हमारी भाषा से
लुप्त हो जाएगी
उसी दिन
रोटी का स्वाद भी
शब्दकोश में शेष रह जाएगा।
-राकेश करण
