अपने लिये जिये तो क्या जिये

अभिषेक एक तहसील मे रहते हैं उनके मन में बहुत ही दया भावना सभी के लिये रहती है,चाहे गली का कुत्ता हो या रोड चलती गाय, मोहल्ले का कोई बच्चा हो, कोई बूढा अपाहिज सभी की सेवा तन मन धन से करते।
एक दिन एक ठेला पालक भाजी, एक ठेला गोभी खरीद कर गायों के लिये गौशाला भेज दी, किसी ने कहा इतनी सारी सब्जी क्यों ली….बोले सडे गले छिलके तो सभी दे देते हैं गायों को, साफ भी तो खिलाओ…. उस व्यक्ति की आखें भर आयी।
रोड की भूखी कुतिया उनके घर आगे रोज आकर बैठ जाती अगर वो न होते तब भी क्योंकि उसको रोज खाने को मिलता था।
उस कुतिया को बच्चा होने वाला था। उसको दूध रोटी एक कटोरे मे रख देते वो चुपचाप खा कर चली जाती। फिर वो अपने छोटे छोटे बच्चों के साथ आने लगी।
रोज एक बंदरिया और उसका बच्चा आवाज करके शटर हिलाते , उनको वो छै केले रोज अपने हाथ से खिलाते।
उनकी दया और सेवा से जानवर तक प्रभावित रहते कहीं बाहर चले जाते तो उन पशुओ की वयवस्था करके जाते। घर के बाहर पशुओं के लिये पानी की नाँद रखना, उसमे नियमित सफाई कर पानी भरना आदि करते।
छोटे छोटे बच्चों को कुल्फी खिला देते, फुग्गा दिला देते बच्चे खुश हो जाते।
एक माला बनाने वाले का बेटा बारहवीं मे अच्छे अंक लाया उसकी इंजीनियर बनने की इच्छा थी परन्तु पैसा न होने की वजह से उसका मन आगे पीछे हो रहा था और काँलेज जाने मे भी हिचकिचाहट हो रही थी, उनने बोला चलो हमारे साथ उसका जबलपुर क्राइसचर्च मे एडमिशन करवा दिया और उसकी सारी फीस की जिम्मेदारी खुद ने ले ली, आज वो एक बडा आँफीसर बन गया उनका एहसान मान कर मिलने आता है, और कहता आप न होते तो मैं भी रोड पर माला बनाता होता. … ऐसा नहीं है कहकर उसको गले लगा लगा लिया.।
भगवान सब व्यवस्था करते हैं निमित्त हमको बना रहे हैं।
उनका कहना था अपने लिये तो क्या जिये दूसरों को देने में जो खुशी है वो कहीं नहीं है।

-अर्चना कटारे
शहडोल (मप्र)

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