विद्यालय के वार्षिक समारोह में इस बार विषय था— “अपराजिता”।
सर्वप्रथम सवाल किया गया , अपराजिता का अर्थ क्या है ,बच्चे ने उत्तर दिया ,” जिसे पराजित न किया जा सके। प्रश्न फिर दोहराया गया, सभी के एक साथ उसी उत्तर को चीरती एक आवाज स्त्री। सब चुप थे बच्ची को मंच पर बुलाया गया रिया मंच पर आई और उत्तर दिया विभिन्न किरदार निभाती स्त्री कभी हार नहीं मानती,कठिन से कठिन परिस्थिति में भी अपने परिवार को संभालने का हुनर उसमें होता है।वह अपना परिचित संसार छोड़कर एक नए परिवेश को अपनाने का साहस करती है!”, उस परिवार को छोड़ एक अंजान परिवार को अपनाने वो हार नहीं मानती, परिवार में किसी की बीमारी में ,अनपढ़ होने पर भी बच्चों की तैयारी में, आर्थिक तंगी में घर की जिम्मेदारी में कभी हार नहीं मानती, तो भला स्त्री से बड़ा अपराजिता का दृष्टांत कौन हो सकता है? रानी लक्ष्मी ले लेकर, घर में काम करती हर स्त्री अपराजिता है।परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन हों, इंसान को अपने हौसले नहीं छोड़ने चाहिए,यही बात समझाती है स्त्रियां ।मेरे लिए वही अपराजिता हैं।आज मुझे समझ आया, ‘अपराजिता’ कोई शब्द नहीं, मेरी माँ का परिचय है।” तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा हॉल गूँज उठा। रिया की माँ की आँखें नम थीं। शायद पहली बार किसी ने उनके रोज़मर्रा के संघर्ष को सम्मान का नाम दिया —’अपराजिता’।उस दिन निर्णायकों ने केवल रिया को ही नहीं, मंच के सामने बैठी उसकी माँ को भी सम्मान के लिए बुलाया। उनकी आँखों में आँसू थे, पर वे हार के नहीं, संघर्ष पर मिली जीत के आँसू थे।
सच ही है, अपराजिता केवल वह नहीं जो युद्ध जीतती है; अपराजिता वह भी है जो हर दिन जीवन की कठिनाइयों से लड़कर मुस्कुराना नहीं छोड़ती।
-सोनम लड़ीवाला
जयपुर (राजस्थान)
