विवाह हुए पांच साल बाद कौशल और ऋतु को शुभ लक्ष्मी के रुप में बेटी की प्राप्ति हुई।
कौशल/ऋतु के घर आंगन में आए इस तुलसी का देख रेख सावधानी से की जाने लगी।
कौशल/ऋतु के लिए जान की प्यारी बनी नवजात बेटी का नाम अपराजिता रखा गया।
समय गुजरता गया और अपराजिता अपने नाम के अनुकूल स्कूल और कॉलेज में नाम कमाती गई।
जो भी प्रतियोगिताएं स्कूल कॉलेज में होती रहीं सबमें अपराजिताअव्वल ही बनी रही।
एक बार जिले में जिला स्तरीय निबंध लिखने की प्रतियोगिता आयोजित की गई।
बड़े बड़े कॉलेज के साहित्य समीक्षक बुलाए गए थे जिससे प्रतिभागियों द्वारा लिखी जाने वाली निबंधों की सही समीक्षा हो सके।
कई कॉलेज के टॉपर छात्र छात्रा प्रतियोगिता में शामिल हुए।
दो घंटे का निबंध लेखन था।
अपराजिता ने पौने दो घंटे में ही निबंध को पूरा कर कॉपी जमा कर दिया।
शेष अन्य प्रतिभागियों ने भी समय पर अपनी अपनी कॉपियां जमा कर गए।
शाम को पांच बजे परिणाम और पारितोषिक वितरण समारोह रखा गया था।
भरपूर आत्मविश्वास के साथ अपराजिता और अपराजिता के माता पिता अच्छे परिणाम की आशा में एक बड़े हॉल में जाकर बैठ गए।
वही हॉल जहाँ परिणाम की घोषणा और पारितोषिक वितरण होना था।
अपनी लेखनी पर विश्वास रखने वाले और कई प्रतिभागी भी हॉल में आकर बैठ गए थे।
इंतज़ार का समय समाप्त हुआ।
ठीक पाॅच बजे निबंध समीक्षकों की मंडली और कलेक्टर सहित जिले के और पदाधिकारी मंच पर आकर बैठ गए।
साहित्यीक अभिभाषण के उपरांत वह भी समय आया जब निबंध लेखन पर विजेताओं के नामों की घोषणा होनी थी।
अपराजिता निश्चिन्त हो अपने जगह पर बैठी रही।
आरंभ में तृतीय स्थान पाने वाले और द्वितीय स्थान पाने वाले विजेताओं को बुलाकर प्रमाण पत्र और मेडल दिया गया।
और जब प्रथम विजेता के नाम की घोषणा की गई तो अपराजिता का नाम लिया गया।
अपराजिता का नाम आते ही हॉल में तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी।
अपराजिता पर जिला वासियों का भरोसा था उस पर वह खरी उतरी।
जैसा नाम वैसा काम।
अपराजिता/अपराजिता ही रही।।
-अजय पाण्डेय ‘बेबस’
