अपराधबोध

सब मेरे अपने ही तो हैं क्या हुआ अगर कभी किसी बात को लेकर कुछ कह दिया तो, हमारे हैं इसीलिए तो कहा वरना बाहर वाले तो दूसरे का तमाशा देखने और बनाने को हमेशा तैयार रहते हैं,लेकिन अगर छोटी बहन निशा ने अरुणा को ही चुप रहने को कहा तो क्या हुआ,लेकिन जब पांच साल का आर्यन बुखार में तप रहा है तो अब अरुणा को अपने किए पर अपराध-बोध हो रहा था कि आर्यन की जगह अगर मेरा बेटा होता तो भी क्या मैं ऐसा बर्ताव करती, दर-असल आर्यन ने उसके विदेश से मंगाए हुए ममंहगे परफ्यूम की बाटल तोड़ दी,उसने जान बूझकर नहीं किया खेलते हुए धोखे से उसका हाथ लग गया और ड्रेसिंग पर रखी बाटल टूट गई, अरुणा ने आव दुखा ना ताव आर्यन का कान जोर से पकड़कर एक जोरदार थप्पड़ लगा दिया जिससे उसकी बहन निशा ने घमंडी और बददिमाग कह दिया,इससे अरुणा का पारा सातवें आसमान पर था,लेकिन अभी कुछ देर पहले ही निशा उसे बिना गुस्सा हुए चाय का कप देकर गई और मुस्कराते हुए सब भूल गई, तब से अरुणा को आर्यन के प्रति अपने व्यवहार पर शर्मिंदगी हो रहही थी क्योंकि पहले अरुणा अपने बड़े होने के मद में कुछ सुनने को ही तैयार नहीं थी,उसे लगा मैं भी तो मौसी हूँ,क्या उसके बेटे का डांट नहीं सकती,लेकिन जिस तरह उसने कान पकड़कर मारा ,तो आर्यन बुरी तरह सहम गया और डर की वजह से उसे बुखार आ गया था,और अब अरुणा को आर्यन की बहुत चिंता हो रही थी,उसने तुरंत डाक्टर को फोन लगाया और अप्वांइट मेंट ले लिया।

-किरण मोर
कटनी (म.प्र)

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