रमेश सरकारी दफ्तर में बाबू था। हर महीने फाइलें पास कराने के नाम पर वो लोगों से सौ-पचास ले लेता। सोचता, “सब लेते हैं, मैं भी ले लूँ तो क्या हुआ।”
एक दिन एक बूढ़ी अम्मा आई। बेटे की पेंशन के लिए तीन महीने से चक्कर काट रही थी। रमेश ने फाइल देखी और बोला, “अम्मा, पाँच सौ लगेंगे। काम जल्दी होगा।”
अम्मा की आँखें भर आईं। फटी सी पोटली से सिक्के निकालकर गिनने लगी। सौ, पचास, दस के सिक्के। कुल चार सौ तीस निकले। बोली, “बेटा, इतने ही हैं। बाकी अगले महीने दे दूँगी। दवाई भी लानी है।”
रमेश ने पैसे लिए और फाइल नीचे दबा दी। सोचा, पूरे पैसे आएँगे तब देखेंगे।
रात को घर पहुँचा तो बेटी बुखार में तप रही थी। डॉक्टर बोला, “दवाई तुरंत लाओ, चार सौ तीस की है।” रमेश का हाथ जेब में गया। वही सिक्के थे, अम्मा वाले।
दवाई लेकर लौटा तो बेटी की आँखों में वही लाचारी दिखी जो सुबह अम्मा की आँखों में थी। रात भर सो नहीं पाया। सिक्कों की खनक कान में गूँजती रही।
सुबह सबसे पहले दफ्तर पहुँचा। अम्मा की फाइल ढूँढी, खुद साहब के पास गया और पेंशन पास कराई। अपनी जेब से सत्तर रुपए डालकर अम्मा को पूरे पाँच सौ लौटाए। बोला, “अम्मा, माफ कर दो। गलती हो गई।”
अम्मा ने पैसे देखे, फिर रमेश का चेहरा। कुछ न बोली, बस सिर पर हाथ फेरकर चली गई।
उस दिन के बाद रमेश ने कभी एक रुपया ऊपर का नहीं लिया। क्योंकि अपराध बोध की सजा, कानून की सजा से बड़ी होती है।
-मंजू सरावगी मंजरी
रायपुर
