“अपराध बोध”

मीनाक्षी को जीतने की आदत थी।
शादी के पहले दिन ही तय कर लिया था इस घर में मेरी चलेगी। सास की रसोई ससुर की बैठक पति का वेतन ननद की शादी हर जगह उंगली।
पहला साल सास को किचन से बाहर किया। पुराने ज़माने का खाना मेरे बच्चे नहीं खाएंगे। सास ने चुपचाप कमरा पकड़ लिया।
तीसरा साल ननद की शादी में क्लेश। दहेज क्यों दें मेरा पति क्या ही कमाता है ।ननद रोकर गई 3 साल मायके नहीं आई।
पांचवां साल ससुर की पेंशन पर कब्ज़ा। बूढ़े को पैसे का क्या काम मैं घर चलाती हूँ। ससुर पार्क में दोस्तों से छुपकर बीड़ी मांगने लगे।
सातवां साल पति से कहा तुम्हारे माँ-बाप बोझ हैं। हम अलग रहेगें। पति ने मना किया तो 15 दिन मायके बैठी रही बच्चे को भी ले गई। लौटी तो शर्त पर माँ-बाप गांव भेजो। पति टूट गया। भेज दिया 10 साल में घर खाली हो गया। सास-ससुर गांव में ननद ससुराल में पति ऑफिस-घर-शराब बच्चे हॉस्टल में। मीनाक्षी जीत गई थी। पूरा घर उसका था। पर घर में था कौन?
“2025 की दिवाली”
13 साल बाद ननद का फोन आया भैया बाबूजी नहीं रहे। गांव आ जाओ। मीनाक्षी पति और बच्चे गांव पहुंचे। 10 साल में पहली बार। आंगन में ससुर की लाश। पास में सास बैठी थी। सूखकर कांटा। मीनाक्षी को देखकर न उठीं न रोईं। बस बोलीं आ गई अब क्रिया-कर्म तू ही कर ले। बेटे से तो होगा नहीं। वो तो तेरा गुलाम है।
वो शब्द नहीं थप्पड़ था।
अर्थी को कंधा देते वक्त पति लड़खड़ा गया। 13 साल से शराब पी रहा था। कंधा मीनाक्षी को देना पड़ा।
श्मशान में जब आग दी तो लपटों में उसे अपना चेहरा दिखा, दीमक का चेहरा।
जिस घर को अपना बनाने चली थी उसे खा गई,
सास की गोद छीनी ,ससुर की इज्जत छीनी ,ननद का मायका छीना ,पति की रीढ़ छीनी, बच्चों का दादा-दादी छीना, रात को गांव के उसी टूटे घर में बैठी थी। सास कोने में बड़बड़ा रही थी मेरा बेटा। पति आंगन में उल्टी कर रहा था। बच्चे अजनबी की तरह सहमे थे।
मीनाक्षी ने पहली बार आईने में देखा। 45 की उम्र में 65 की लग रही थी।
अपराधबोध आया समंदर की तरह। डुबो देने वाला पर अब
ससुर लौटेंगे नहीं,
सास माफ करेगी नहीं,
पति सुधरेगा नहीं,
बच्चे अपना बचपन भूलेंगे नहीं,
तो इस अपराधबोध का औचित्य क्या?
यही कि कम से कम अब दीमक को पता चल गया कि वो दीमक है।
वरना वो तो खुद को रानी समझ रही थी 13 साल।
अगली सुबह मीनाक्षी ने सास के पैर पकड़े माँ गांव नहीं छोड़ूंगी। यहीं रहूंगी। आपकी सेवा करूँगी, सास ने पैर खींच लिए सेवा अब किसकी। जिस घर को तूने जलाया उसकी राख बची है। राख की सेवा नहीं होती बेटा बस सिर पर मलते हैं। तू भी मल ले।औचित्य यही है ।
अपराधबोध वापसी का टिकट नहीं है। वो सिर्फ जुर्म कबूल की रसीद है।

बेफिक्र वही हो सकता है जिसने फिक्र को फर्ज बना लिया
मीनाक्षी ने फिक्र को अहंकार बना लिया था। नतीजा सामने है

-आनंद पाण्डेय ‘केवल’

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