प्रेम वो आख़िरी पंक्ति है
जिसे पढ़ते हुए
मैं ज़िंदगी की आँखों में उतर जाती हूँ
पाती हूँ ख़ुद को
जैसे कोई अपनी खोई हुई ग़ज़ल का आख़िरी मिसरा
किसी किताब के बीच में पाता है
एक चाँदनी रात का टुकड़ा
मेरे भीतर उतरता है
नसों में जुगनू की रोशनी लिए बहता है
मैं प्रेम को छूती हूँ
और मेरे हाथों में
किसी प्राचीन सभ्यता का अक्षर जागता है
जिसे मुहर के रूप में
पहली बार किसी की देह पर छापा गया होगा
प्रेम की परिभाषा
मेरे कान में
बुलबुल के पंखों की फड़फड़ाहट की तरह आती हैं
हर बार एक नए रंग की एक नई दुनिया
हर विराम में एक नया आकाश
मैं प्रेम को सुनती हूँ
और मेरे भीतर की सारी भाषाएँ
एक साथ चुप हो जाती हैं
जैसे कोई किताब
अपने अंतिम पृष्ठ पर पहुँचकर
ख़ुद को पढ़ने वाले के हाथों में सौंप देती है
मैं प्रेम को पढ़ती हूँ
और मेरे भीतर की सारी स्मृतियाँ
एक साथ जागती हैं
जैसे कोई पुराना शहर
खंडहरों में
अपने खोए हुए अस्तित्व को पहचानता है
मेरे भीतर एक प्राचीन नदी बहने लगती है
जिसके किनारे
किसी ने पत्थरों पर
प्रेम की पहली पंक्ति उकेरी थी
प्रेम, मेरी रात की आख़िरी पंक्ति है
-शोभा अक्षर
