आत्ममंथन का हासिल

वामिका आज फिर देर रात तक जाग रही थी। कमरे में हल्की पीली रोशनी फैली हुई थी। बाहर सड़क पर सन्नाटा पसरा था, लेकिन उसके कमरे में अब भी शब्द जाग रहे थे। सामने लैपटॉप खुला था, मेज़ पर बिखरी डायरियाँ थीं, कुछ अधूरी पांडुलिपियाँ थीं और दवाइयों के साथ रखा चश्मा बार बार उसकी थकान का एहसास करा रहा था।
आँखों में जलन थी, कंधों में दर्द था, फिर भी उसकी उंगलियाँ लगातार कीबोर्ड पर चल रही थीं।
वह पिछले कई घंटों से रचनाएँ संपादित कर रही थी। किसी कविता की मात्राएँ सुधार रही थी, किसी लेख का शीर्षक बदल रही थी, किसी नए रचनाकार को संदेश भेज रही थी।
*“निराश मत होइए। लिखते रहिए। शब्द कभी व्यर्थ नहीं जाते।”*
घर के लोग कई बार उसे समझा चुके थे कि अब उसे अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देना चाहिए। उम्र, बीमारी और लगातार काम धीरे धीरे उसके शरीर को थका रहे थे। लेकिन वामिका के लिए साहित्य केवल रुचि नहीं था। वह उसे *साधना* मानती थी।
उसे हमेशा लगता था कि हर रचना के पीछे कोई धड़कता हुआ मन होता है। कोई अपना अकेलापन लिखता है, कोई अपने भीतर की चुप्पी, कोई जीवनभर का संघर्ष। शायद यही कारण था कि वह हर नए लेखक को उतनी ही गंभीरता से पढ़ती थी जितना किसी स्थापित साहित्यकार को।
पिछले कुछ वर्षों में उसने अपनी संस्था, वेबसाइट और साहित्यिक मंचों के माध्यम से अनेक नए रचनाकारों को प्रकाशित किया था। सुबह से रात तक उसका अधिकांश समय उसी में बीतता। कभी वेबसाइट अपडेट करना, कभी पोस्टर तैयार करवाना, कभी फेसबुक समूहों में लिंक साझा करना, कभी किसी झिझकते लेखक को प्रोत्साहित करना।
कई लोग पहली बार उसकी वजह से प्रकाशित हुए थे। किसी ने वर्षों बाद अपनी कविता फिर से लिखी थी। किसी गृहिणी ने घर और जिम्मेदारियों के बीच अपनी पहचान खोजी थी।
इन सबके बीच वामिका को हमेशा लगता था कि वह केवल रचनाएँ नहीं, लोगों के भीतर सोया आत्मविश्वास प्रकाशित कर रही है।
उस दिन भी उसने पूरे मन से बारह लिंक साझा किए थे। उसे लगा था कि लोग पढ़ेंगे, चर्चा करेंगे, एक दूसरे को प्रोत्साहित करेंगे। उसे विश्वास था कि साहित्य अभी पूरी तरह संवेदनहीन नहीं हुआ है।
लेकिन रात तक स्क्रीन लगभग वैसी ही रही।

न प्रतिक्रियाएँ बढ़ीं, न टिप्पणियाँ।
कुछ देर तक वह चुप बैठी स्क्रीन को देखती रही।
उसके भीतर पहली बार एक गहरी थकान उतरी।
वह सोचने लगी।
क्या लोगों को सच में साहित्य चाहिए या केवल अपना प्रकाशित होना।
क्या अब पढ़ने की जगह केवल दिखना रह गया है।
क्या शब्दों का संसार भी धीरे धीरे आत्मकेंद्रित होता जा रहा है।
उसे लगा जैसे लोग प्रकाशित तो होना चाहते हैं, लेकिन दूसरों को पढ़ने का धैर्य खो चुके हैं।
प्रोत्साहन की अपेक्षा सबको थी, लेकिन देने की इच्छा बहुत कम लोगों में बची थी।
एक क्षण को उसके मन में आया कि सब बंद कर दे।
वह चाहती तो केवल अपनी रचनाएँ लिख सकती थी। उसका अपना ब्लॉग था, अपने पाठक थे। इतनी मेहनत, इतना समय और इतनी मानसिक ऊर्जा वह क्यों दे रही है उन लोगों के लिए जिन्हें दूसरों को पढ़ने तक में रुचि नहीं।
उसने धीरे से लैपटॉप बंद कर दिया।
कमरे में अचानक एक भारी सन्नाटा भर गया।
वामिका कुर्सी से टिक गई।
उसकी आँखें बंद थीं, लेकिन भीतर विचारों का शोर बहुत तेज था।
तभी मोबाइल की स्क्रीन चमकी।
एक अनजान नंबर से संदेश आया था।
“दीदी, मेरी पहली रचना आपने प्रकाशित की। आज मेरे बेटे ने पहली बार मुझे ‘लेखिका’ कहकर बुलाया। मैं बहुत खुश हूँ।”
वामिका लंबे समय तक उस संदेश को पढ़ती रही।
धीरे-धीरे उसके भीतर जैसे कुछ पिघलने लगा।
उसे याद आने लगा।
वह बुज़ुर्ग कवि, जिसकी रचना वर्षों बाद प्रकाशित हुई थी।
वह लड़की, जिसने पहली बार अपनी कविता सार्वजनिक होते देख आत्मविश्वास पाया था।
वे गृहिणियाँ, जिन्होंने अपने भीतर छिपी लेखिका को पहचाना था।
वामिका समझ गई कि हर काम भीड़ के शोर से नहीं मापा जाता।
कुछ कार्यों का मूल्य आँकड़ों में नहीं, प्रभाव में होता है।
हर पौधा फल नहीं देता, लेकिन छाँव देने वाले वृक्ष भी कभी किसी ने चुपचाप ही लगाए थे।
वह देर तक स्वयं से बात करती रही।
यही उसका आत्ममंथन था।
और उसी आत्ममंथन का हासिल धीरे धीरे उसके भीतर स्पष्ट होने लगा।
उसे समझ में आ गया कि साहित्य केवल पढ़े जाने का माध्यम नहीं, संवेदनाओं को जीवित रखने का दायित्व भी है।
हर पाठक दिखाई दे, यह आवश्यक नहीं।
हर प्रयास पर प्रतिक्रिया मिले, यह भी जरूरी नहीं।
कई बार एक अनदेखा पाठक, एक नया आत्मविश्वास और किसी के चेहरे की छोटी सी मुस्कान ही पूरे श्रम का हासिल बन जाती है।
कई बार किसी टूटते हुए मन को शब्द दे देना ही सबसे बड़ी उपलब्धि होती है।
वामिका ने फिर लैपटॉप खोला।
धीरे-धीरे अगली रचना संपादित करने लगी।
इस बार उसने आँकड़े नहीं देखे।
न पहुँच, न लाइक, न टिप्पणियाँ।
अब उसके चेहरे पर शिकायत नहीं थी।
सिर्फ एक शांत दृढ़ता थी।
उसने मन ही मन तय कर लिया था कि वह साहित्य को प्रतिक्रिया के लिए नहीं, अपने विश्वास के लिए जिएगी।
जो पढ़ेंगे, वे जुड़ेंगे।
जो नहीं पढ़ेंगे, समय उन्हें आगे बढ़ा देगा।
लेकिन उसके हिस्से का काम रुकना नहीं चाहिए।
रात अब और गहरी हो चुकी थी।
वामिका ने स्क्रीन पर झुककर एक नई रचना प्रकाशित की और हल्की मुस्कान के साथ कुर्सी से टिक गई।
उसे अपने आत्ममंथन का हासिल मिल चुका था।
अपेक्षाएँ मन को थका सकती हैं, लेकिन साधना कभी नहीं थकती।
और जब तक उसके भीतर शब्दों की लौ जलती रहेगी, वह बिना किसी अपेक्षा के साहित्य की लौ को बुझने नहीं देगी।

डॉ. प्रीति समकित सुराना

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