आज एक जिन्न से मुलाकात हुई
पहले मैं कुछ डरी सहमी
फिर थोड़ी-थोड़ी बात हुई
जिन्न खुश हुआ और
मुझे एक करामाती बायोस्कोप दे गया
उससे खुद के अंदर देखा
तो पूरा संसार दिखा
जहां मैं घूम रही थी
अपना ही हाथ थामे हुए
मैंने देखा विवेक के घोड़े पर बैठ
अहंकार चाबुक दिखा रहा था
पहन मुखोटे सादगी के
कोई अय्यार भी जा रहा था
थोड़ी दूर एक शिवाला दिखा
जहां अंदर अंधेरा और
बाहर उजाला दिखा
कोई स्त्री दिखी
रूप की ही ताब में
जैसे मर्यादा
बहा दी हो चिनाब में
एक ऊंचे से वृक्ष से
बह रहा मकरंद था
देखा जो पास से
चाटुकारिता का स्पंद था
एक ओम का नाद गूंज रहा हर ओर था
लेकिन वह तो सबसे ही बोर था
एक प्यारी सी छोटी कन्या
लगता है मेरी मासूमियत थी
एक उफनती सी नदियां
ईर्ष्या की भी थी
कहीं कटु शब्दों के बाण से थे
कहीं सपनों के वृक्ष फलदार से थे
एक झाड़ी के पीछे
कुछ दुबले पतले शरीर थे
लगा जैसे निस्वार्थता के मारे फकीर थे
चलते-चलते अब मैं थक गई थी
और पहुंच गई थी मणिकर्णिका
जहां हर ओर विदाई का उत्सव था
यात्रा थी अंत से अनंत की
फिर जिन्न ने बायोस्कोप ले लिया
और मुझे फिर से
वही संसार दिखने लगा
यह जिन्न कोई और नहीं
मेरी अंतरात्मा थी
या कहें मेरी आत्मानुभूति……
-अनुपमा शर्मा
रुड़की
